रानी और महात्मा साधु ली | प्रेरणादायक हिंदी कहानी

रानी और महात्मा साधु ली | प्रेरणादायक हिंदी परी-कथा | ज्ञान और शांति की कहानी
रानी और महात्मा साधु ली | प्रेरणादायक हिंदी परी-कथा | ज्ञान और शांति की कहानी


रानी और महात्मा साधु ली

(एक आध्यात्मिक, जादुई और प्रेरणादायक परी-कथा)

बहुत समय पहले की बात है। हिमालय की तलहटी में बसा हुआ सुवर्णपुर नाम का एक समृद्ध और सुंदर राज्य था। यह राज्य अपने सोने जैसे खेतों, शांत नदियों और न्यायप्रिय शासन के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। सुवर्णपुर की रानी थीं — रानी वैदेही
रानी वैदेही सुंदर तो थीं ही, पर उससे भी अधिक वे बुद्धिमान, करुणामयी और सत्यप्रिय थीं। उन्होंने कम उम्र में ही राजपाट संभाल लिया था, क्योंकि उनके पति राजा वीरसेन युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। तब से रानी ने ही राज्य की बागडोर थाम रखी थी।
रानी का अंतर्द्वंद्व
राज्य में सुख-शांति थी, प्रजा संतुष्ट थी, खजाना भरा हुआ था — फिर भी रानी के मन में एक अजीब-सी खालीपन की अनुभूति रहती थी।हर रात महल की छत पर खड़े होकर वे आकाश को निहारतीं और सोचतीं
यदि सब कुछ ठीक है, तो मेरे मन को शांति क्यों नहीं मिलती?”
रानी को लगता था कि जीवन केवल शासन, वैभव और आदेशों तक सीमित नहीं है। कहीं कुछ ऐसा है, जो उनसे छूट रहा है।
साधु ली का आगमन
एक दिन राज्य में समाचार फैला कि जंगलों के पार, पुराने वटवृक्ष के नीचे एक महात्मा साधु ली आए हैं।कहा जाता था कि वे न तो किसी से कुछ मांगते थे, न किसी को उपदेश देते थे, फिर भी जो उनके पास बैठता, उसका जीवन बदल जाता।
साधु ली के बारे में कई रहस्य प्रचलित थे —
कोई कहता वे सदियों पुराने हैं
कोई कहता वे भविष्य देख सकते हैं
तो कोई कहता कि वे देवताओं के दूत हैं
रानी वैदेही ने पहली बार किसी साधु के बारे में इतनी उत्सुकता महसूस की।

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पहली भेंट
रानी ने बिना किसी शाही ठाठ-बाट के, सामान्य वस्त्र पहनकर साधु ली से मिलने का निश्चय किया।जब वे वटवृक्ष के पास पहुँचीं, तो उन्होंने देखा —एक शांत मुखमुद्रा वाला साधु, मिट्टी पर बैठे, आँखें बंद किए ध्यान में लीन हैं।
रानी ने आदर से कहा,“महात्मा, मैं सुवर्णपुर की रानी वैदेही हूँ।”
साधु ली ने आँखें खोलीं, हल्की मुस्कान आई और बोले,“रानी तो आप हैं, पर खोजी आत्मा भी।”
रानी चौंक गईं। उन्होंने कुछ कहा ही नहीं था, फिर भी साधु ने उनके मन की बात जान ली।
प्रश्नों का आरंभ
रानी बोलीं,“मेरे पास सब कुछ है, फिर भी मन अशांत है। इसका कारण क्या है?”
साधु ली ने जमीन से एक सूखा पत्ता उठाया और बोले,“यह पत्ता पेड़ से अलग हो गया, इसलिए सूखा है। मन भी जब आत्मा से अलग हो जाता है, तो अशांत हो जाता है।”
रानी ने पहली बार जीवन को इस दृष्टि से देखा।
परीक्षा का प्रस्ताव
साधु ली ने कहा,“यदि आप वास्तव में शांति चाहती हैं, तो आपको तीन परीक्षाओं से गुजरना होगा।”
रानी बिना हिचक बोलीं,“मैं तैयार हूँ।”

पहली परीक्षा: त्याग
साधु ली ने कहा,“आपको एक दिन के लिए रानी नहीं, सामान्य स्त्री बनकर राज्य में रहना होगा।”
रानी ने अपने आभूषण उतार दिए, रेशमी वस्त्र छोड़ दिए और साधारण कपड़े पहन लिए।
उस दिन उन्होंने देखा —
एक किसान कर में डूबा है
एक विधवा भूखी है
एक बच्चा शिक्षा से वंचित है
रानी का हृदय भर आया। उन्हें एहसास हुआ कि शासन केवल आदेश देने का नाम नहीं, बल्कि पीड़ा को महसूस करने का नाम है।
दूसरी परीक्षा: सत्य
दूसरे दिन साधु ली ने कहा,“आज आपको अपने सबसे बड़े भय का सामना करना होगा।”
रानी ध्यान में बैठींउन्हें अपने पति की मृत्यु, अकेलापन और असफल होने का डर दिखाआँसू बहने लगे, पर वे भागीं नहीं।
साधु ली बोले,“जो भय से भागता है, वह जीवन से भागता है।”
रानी ने पहली बार अपने डर को स्वीकार किया।
तीसरी परीक्षा: करुणा
तीसरी परीक्षा में रानी को उस व्यक्ति को क्षमा करना था, जिसने कभी उनके पति के विरुद्ध षड्यंत्र रचा था।
यह कठिन था, पर रानी ने कहा,“दंड से नहीं, करुणा से आत्मा बदलती है।”
उन्होंने उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया।

साधु ली का रहस्य
तीनों परीक्षाओं के बाद साधु ली बोले,“अब तुम जान चुकी हो कि शांति बाहर नहीं, भीतर है।”
रानी ने पूछा,“आप कौन हैं, महात्मा?”
साधु ली मुस्कराए और बोले,“मैं वही हूँ, जो हर युग में आता है — कभी साधु बनकर, कभी विचार बनकर।”
इतना कहकर वे धीरे-धीरे प्रकाश में विलीन हो गए

बदली हुई रानी
रानी वैदेही अब वैसी नहीं रहीं।उन्होंने —
करों में राहत दी
शिक्षा को अनिवार्य बनाया
स्वयं हर सप्ताह जनता के बीच बैठने लगीं
सुवर्णपुर अब केवल समृद्ध ही नहीं, बल्कि आत्मिक रूप से समृद्ध राज्य बन गया।
कथा का संदेश
इस कथा का सार यही है कि —
सच्चा परिवर्तन सत्ता से नहीं, समझ से आता है।और सच्ची शांति बाहरी वैभव में नहीं, आंतरिक जागृति में है।
आज भी कहा जाता है कि यदि कोई सच्चे मन से उस वटवृक्ष के नीचे बैठे, तो उसे साधु ली की अनुभूति होती है।

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