रानी और गाँव का दीसनामका रुसी
(एक मौलिक हिंदी परी-कथा)
बहुत समय पहले की बात है। पहाड़ों और नदियों से घिरे एक सुंदर राज्य में सुवर्णगढ़ नाम का एक समृद्ध राज था। इस राज्य की धरती उपजाऊ थी, हवाएँ सुगंधित थीं और लोग सरल हृदय वाले थे। सुवर्णगढ़ पर शासन करते थे राजा वीरेंद्रसेन, जो न्यायप्रिय और पराक्रमी माने जाते थे। उनकी पत्नी रानी पद्मावती सौंदर्य, बुद्धि और करुणा का अनुपम संगम थीं।राजमहल की ऊँची प्राचीरों के भीतर रहने वाली रानी पद्मावती का हृदय महल की दीवारों जितना सीमित नहीं था। उन्हें अक्सर लगता कि सच्चा सुख तभी है जब राज्य का हर व्यक्ति सुखी हो। इसलिए वे समय-समय पर भेष बदलकर गाँवों में जातीं, लोगों का दुःख-सुख जानतीं और उनकी सहायता करतीं।
सुवर्णगढ़ से कुछ कोस दूर एक छोटा-सा गाँव था—नरसीपुर। यह गाँव घने जंगल और सूखी पहाड़ियों के बीच बसा था। यहाँ के लोग मेहनती थे, पर भाग्य हमेशा उनका साथ नहीं देता था। कई वर्षों से गाँव पर अजीब-सी विपत्ति छाई हुई थी। खेत सूखने लगे थे, कुएँ जवाब दे रहे थे और मवेशी बीमार पड़ रहे थे।
इसी गाँव में रहता था एक युवक—दीसनामका रुसी।
दीसनामका रुसी कौन था?
रुसी कोई साधारण नाम नहीं था। गाँव के बुज़ुर्ग बताते थे कि उसके जन्म के समय एक विचित्र घटना घटी थी। तेज़ आँधी, बिजली की गड़गड़ाहट और फिर अचानक शांति। तभी किसी साधु ने कहा था—“इस बालक का नाम दीसनामका रुसी होगा। इसके भाग्य में संकट भी है और समाधान भी।”
रुसी बचपन से ही अलग स्वभाव का था। वह ताकतवर नहीं था, पर उसकी आँखों में गहरी समझ थी। वह कम बोलता, पर जो बोलता, सोच-समझकर। उसे जंगल, पशु-पक्षी और प्रकृति से अजीब-सा लगाव था। गाँव के लोग उसे कभी-कभी ताने भी देते—“अरे, ये तो जंगल का दीवाना है, इससे क्या होगा!”
लेकिन जब भी कोई संकट आता, रुसी चुपचाप मदद करता। किसी का खेत सूख जाए तो वह पानी का नया रास्ता खोजता, किसी का पशु बीमार पड़े तो जड़ी-बूटियाँ लाता।
गाँव पर छाया भय
नरसीपुर के पास एक पुराना टीला था, जिसे लोग काला टीला कहते थे। मान्यता थी कि वहाँ एक पुरानी शक्ति सोई हुई है। पिछले कुछ सालों से उसी दिशा से अजीब घटनाएँ होने लगी थीं—रात को अजीब रोशनी, हवा में फुसफुसाहट, और कभी-कभी लोगों के सपनों में डरावने संकेत।
गाँव वाले डरने लगे। उन्होंने देवी-देवताओं की पूजा की, बलि दी, पर हालात बदले नहीं।
उसी समय रानी पद्मावती को गाँवों की दुर्दशा की खबर मिली। उन्होंने निश्चय किया कि इस बार वे स्वयं नरसीपुर जाएँगी।
रानी और रुसी की पहली मुलाकात
एक सुबह रानी साधारण वस्त्र पहनकर, केवल एक दासी के साथ नरसीपुर पहुँचीं। गाँव के लोग उन्हें पहचान नहीं पाए। वे गाँव की गलियों में घूमती रहीं, लोगों से बात करती रहीं।
तभी उनकी नज़र एक युवक पर पड़ी, जो कुएँ के पास बैठा कुछ पत्तों और जड़ों को जोड़ रहा था। उसकी आँखों में अजीब-सी शांति थी।
रानी ने पूछा,“क्या कर रहे हो?”
रुसी ने सिर उठाया,“गाँव के कुएँ का पानी कड़वा हो गया है। ये जड़ी-बूटियाँ उसे ठीक कर सकती हैं।”
रानी चकित हुईं।“तुम्हें ये सब कैसे पता?”
रुसी मुस्कराया,“प्रकृति खुद बताती है, बस सुनना आना चाहिए।”
उस क्षण रानी को लगा कि यह युवक साधारण नहीं है।
रहस्य का खुलासा
रानी ने रुसी से गाँव की परेशानी के बारे में पूछा। रुसी ने बताया कि काला टीला असल में एक पुराना रक्षक स्थल था, जहाँ कभी प्रकृति की रक्षा करने वाली शक्ति रहती थी। लेकिन समय के साथ लोगों ने उसका अपमान किया—पेड़ काटे, जलस्रोत सुखाए।
अब वही शक्ति क्रोधित होकर गाँव को संकेत दे रही थी।
रानी ने गंभीर स्वर में कहा,“तो समाधान क्या है?”
रुसी बोला,“शक्ति को शांत करना होगा। लेकिन इसके लिए किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत है, जिसका हृदय निर्मल हो और जो अपने पद का अहंकार छोड़ सके।”
रानी समझ गईं—यह काम आसान नहीं।
सच सामने आता है
रानी ने अपना परिचय दिया। जैसे ही लोगों को पता चला कि उनके सामने स्वयं रानी खड़ी हैं, सब भय और सम्मान से झुक गए। लेकिन रुसी शांत रहा।
रानी ने पूछा,“तुम नहीं झुके?”
रुसी ने उत्तर दिया,“सम्मान दिल में होता है, झुकने में नहीं।”
यह सुनकर रानी के मन में उसके लिए और आदर जागा।
काला टीला और अंतिम परीक्षा
रानी और रुसी काला टीला पहुँचे। वहाँ वातावरण भारी था। हवा थमी हुई थी। अचानक धरती काँपी और एक दिव्य स्वर गूंजा—
“क्यों आए हो?”
रानी आगे बढ़ीं,“मैं अपने राज्य की रानी हूँ। यदि दोष मेरा है, तो दंड भी मुझे ही मिले।”
शक्ति प्रसन्न हुई।“बहुत वर्षों बाद कोई शासक ऐसा मिला।”
लेकिन अंतिम परीक्षा बाकी थी। शक्ति ने कहा कि राज्य को बचाने के लिए रानी को अपना राजसी वैभव त्यागना होगा और रुसी को अपना जीवन गाँव के लिए समर्पित करना होगा।
दोनों ने बिना हिचक स्वीकार किया।
नई शुरुआत
जैसे ही दोनों ने संकल्प लिया, आकाश साफ हो गया। वर्षा हुई। कुएँ भर गए। खेत हरे हो उठे।
रानी ने वापस जाकर राजा को सब बताया। राजा ने रुसी को राज्य का प्रकृति सलाहकार नियुक्त किया और नरसीपुर को विशेष संरक्षण दिया।
रुसी ने कभी धन या पद का घमंड नहीं किया। वह पहले जैसा ही रहा—सरल, शांत और प्रकृति से जुड़ा।
रानी पद्मावती ने समझ लिया कि सच्ची शक्ति सिंहासन में नहीं, बल्कि त्याग और समझ में होती है।
कहानी की सीख
इस तरह दीसनामका रुसी, जिसे कभी लोग तुच्छ समझते थे, पूरे राज्य के लिए आशा की किरण बन गया। और रानी, जो पहले से महान थीं, और भी महान बन गईं—क्योंकि उन्होंने झुकना सीखा।
कहानी यहीं समाप्त नहीं होती, बल्कि हर उस दिल में शुरू होती है जो प्रकृति, मानवता और सच्चाई को समझना चाहता है।

0 टिप्पणियाँ