बाबरीयो भूत और गाँव के लोग | डर, सच्चाई और इंसानियत की कहानी

बाबरीयो भूत और गाँव के लोग

बाबरीयो भूत और गाँव के लोग | डर, सच्चाई और इंसानियत की कहानी


एक रहस्यमयी, भावुक और प्रेरणादायक हिंदी परी-कथा
बहुत समय पहले की बात है। घने जंगलों और सूखे पहाड़ों के बीच बसा हुआ एक छोटा-सा गाँव था—सोनपुरा। यह गाँव जितना सुंदर था, उतना ही रहस्यमय भी। सुबह सूरज की किरणें जब कच्चे घरों की दीवारों पर पड़तीं, तो पूरा गाँव सोने जैसा चमक उठता। लेकिन जैसे ही शाम ढलती, गाँव के लोगों के दिलों में एक अनजाना डर उतर आता।
उस डर का नाम था—बाबरीयो भूत।
गाँव में फैला डर
सोनपुरा के बच्चे शाम होते ही घरों में बंद कर दिए जाते। औरतें दरवाज़ों पर नींबू-मिर्च लटकातीं, और बुज़ुर्ग अलाव के पास बैठकर डरावनी कहानियाँ सुनाते।
कहते थे—
“अगर रात के तीसरे पहर जंगल की ओर से अजीब-सी हँसी सुनाई दे, तो समझ लेना… बाबरीयो भूत जाग गया है।”
कुछ लोग कहते कि बाबरीयो भूत लंबा-सा काला साया है, जिसकी आँखें अंगारों की तरह जलती हैं।कुछ कहते कि वह पुराने कुएँ के पास रहता है।तो कुछ का मानना था कि वह कभी इंसान था… जिसे गाँव ने ही भूत बना दिया।
लेकिन सच्चाई कोई नहीं जानता था।
बाबरीयो की पहली झलक
गाँव में एक लड़का रहता था—मोहन। उम्र करीब सत्रह साल, आँखों में जिज्ञासा और दिल में हिम्मत। मोहन बाकी लोगों की तरह डरपोक नहीं था। उसे हर कहानी के पीछे की सच्चाई जानने की आदत थी।
एक रात, जब पूरा गाँव गहरी नींद में था, मोहन ने जंगल से आती एक धीमी-सी कराह सुनी।
“ये भूत नहीं… ये दर्द की आवाज़ है,” उसने खुद से कहा।
हिम्मत जुटाकर वह जंगल की ओर बढ़ गया।
चाँदनी रात में, पुराने पीपल के पेड़ के नीचे उसे एक अजीब-सी आकृति दिखी—लंबे उलझे बाल, फटे कपड़े और चेहरा… जो डरावना नहीं, बल्कि बेहद दुखी लग रहा था।
वही था—बाबरीयो।
भूत नहीं, एक टूटी हुई आत्मा
मोहन डर के मारे भागा नहीं। उसने काँपती आवाज़ में पूछा,“तुम… तुम बाबरीयो हो?”
आकृति ने धीरे-धीरे सिर उठाया।“हाँ… लोग मुझे भूत कहते हैं,” भारी और थकी हुई आवाज़ आई।
मोहन ने हिम्मत करके पूछा,“पर तुम भूत क्यों बने?”
बाबरीयो की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने अपनी कहानी सुनानी शुरू की।
बाबरीयो की कहानी
कभी बाबरीयो भी इसी गाँव का एक साधारण आदमी था। गरीब, लेकिन ईमानदार। वह गाँव के लोगों के लिए जंगल से लकड़ी लाता, कुएँ से पानी भरता और बीमारों की मदद करता।
लेकिन एक दिन गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। लोग भूखे मरने लगे। किसी ने अफवाह फैला दी कि—
“बाबरीयो काले जादू से पानी रोक रहा है।”
डर और अंधविश्वास में अंधे गाँव वालों ने बाबरीयो को पीट दिया, उसके घर को जला दिया और उसे जंगल में भगा दिया।
भूख, दर्द और अपमान ने बाबरीयो को तोड़ दिया। उसी जंगल में उसकी मौत हो गई।
“मरने के बाद भी,” बाबरीयो बोला,“मुझे शांति नहीं मिली… क्योंकि मेरा दर्द अनसुना रह गया।”
गाँव वालों की सच्चाई
मोहन की आँखें भर आईं। उसने समझ लिया कि बाबरीयो भूत नहीं, बल्कि गाँव वालों की गलती का आईना है।
अगले दिन मोहन ने गाँव में सबको सच्चाई बताई। पहले तो लोग हँसे।
“भूत से दोस्ती कर ली क्या?”“डर के मारे पागल हो गया है!”
लेकिन उसी रात बाबरीयो ने गाँव को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया। उल्टा, उसने सूखे कुएँ से पानी निकालने का रास्ता दिखाया। अगली सुबह कुएँ में सचमुच पानी आ गया।
गाँव वाले हैरान रह गए।
डर से पश्चाताप तक
धीरे-धीरे गाँव वालों को एहसास हुआ कि वे गलत थे। उन्होंने बाबरीयो से माफी माँगने का फैसला किया।
एक रात, पूरे गाँव के लोग पीपल के पेड़ के नीचे इकट्ठा हुए। हाथों में दीपक और आँखों में शर्म।
गाँव के मुखिया ने कहा,“बाबरीयो, हमने तुम्हें समझे बिना सजा दी। हमें माफ कर दो।”
जंगल में हल्की हवा चली। बाबरीयो प्रकट हुआ।
“मुझे बदला नहीं चाहिए,” उसने कहा,“मुझे सिर्फ सच और इंसानियत चाहिए थी।”
मुक्ति का क्षण
गाँव वालों ने बाबरीयो की याद में एक छोटा मंदिर बनवाया। हर साल वहाँ दीप जलाया जाने लगा—डर से नहीं, सम्मान से।
उस रात बाबरीयो ने मुस्कराकर मोहन से कहा,“अब मेरा दर्द हल्का हो गया है।”
धीरे-धीरे उसकी आकृति रोशनी में बदलने लगी।
“याद रखना,” उसकी आवाज़ गूँजी,“असली भूत अंधविश्वास और नफरत होते हैं।”
और फिर… बाबरीयो हमेशा के लिए चला गया।
कहानी की सीख
उस दिन के बाद सोनपुरा गाँव बदल गया। लोग डर से नहीं, समझ से जीने लगे। किसी को बिना सुने दोषी नहीं ठहराया गया।
और मोहन?वह गाँव का सबसे समझदार इंसान बन गया।
आज भी जब कोई सोनपुरा जाता है, तो लोग कहते हैं—
“यहाँ कभी बाबरीयो भूत रहता था…लेकिन उसने हमें इंसान बनना सिखा दिया।”


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