गरीब मजदूर का कच्चा घर कहानी
📖 पूरी कहानी
मेरा घर बहुत बड़ा नहीं है।लोग उसे घर भी नहीं कहते।कोई “झोपड़ी” कह देता है,कोई “कच्चा मकान”।
पर मेरे लिएवही मेरी पूरी दुनिया है।
मेरा घर कैसा है
मेरे घर की दीवारेंमिट्टी और ईंट की हैं।
कई जगह सेप्लास्टर गिर चुका है।
छत टीन की है।बरसात में टपकती है,सर्दी में ठण्ड उतर आती है,गर्मी में आग बरसती है।
फिर भीयही छतमेरे परिवार को ढकती है।
सुबह की शुरुआत
सुबह जब मैं उठता हूँतो सबसे पहलेघर की दीवारों को देखता हूँ।
सोचता हूँ —आज ये टिकी रहें,आज बारिश न आए।
मेरी पत्नी चूल्हा जलाती है।गीली लकड़ी से धुआँ निकलता है।आँखें जलती हैं,पर खाना बनाना ज़रूरी है।
मेरे बच्चे और ये घर
मेरे बच्चेइसी कच्चे फर्श पर खेलते हैं।
उनके पासअलग कमरा नहीं,अलग बिस्तर नहीं।
रात कोसब एक साथ सोते हैं।
जब छत सेपानी टपकता है,तो बाल्टी रख देते हैं।
बच्चे डरते हैं,मैं उन्हें चुप कराता हूँ।
घर की चिंता, काम से ज़्यादा
काम पर जाते वक्तमेरे मन मेंसिर्फ़ काम नहीं होता।
सोचता हूँ —आज कोई दीवार गिरी तो?छत उड़ी तो?
घर छोड़कर जानामेरे लिए सबसे मुश्किल होता है।
क्योंकि मैं जानता हूँमेरे न होने परइस घर की कोई ताकत नहीं।
गरीब आदमी के घर की सच्ची कहानी | एक मजदूर का घर, परिवार और रोज़ की ज़िंदगी
शाम का डर
शाम कोजब मैं घर लौटता हूँतो पहले छत देखता हूँ।
अगर सब ठीक हैतो साँस आती है।
घर छोटा है,पर उसमेंमेरे बच्चों की हँसी है।
पैसों की सच्चाई
लोग कहते हैं —पक्का घर क्यों नहीं बनाते?
मैं हँस देता हूँ।
जो रोज़ की कमाईरोटी में चली जाए,वो ईंट कहाँ से लाए?
गरीब आदमीघर का सपनाधीरे-धीरे देखता है।
रात और दुआ
रात कोमैं छत की तरफ देखता हूँ।
भगवान सेएक ही बात कहता हूँ:
बस ये घरमेरे बच्चों के सिर परकायम रहे।
मुझे कुछ और नहीं चाहिए।
मेरी सच्चाई
मेरा घरकमज़ोर है,पर मेरा हौसला नहीं।
मेरी दीवारेंकच्ची हैं,पर मेरा रिश्ताअपने परिवार से पक्का है।
आख़िरी बात
अगर कभीकिसी गरीब का घर देखें,तो उसकी दीवारें मत देखिए।
उसके अंदर बैठीज़िंदगी को देखिए।

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