ठण्ड में गरीब रिक्शेवाले की सच्ची कहानी
मेरी सुबह – जब ठण्ड हड्डियों में उतर जाती है
मेरी सुबह बहुत ठण्डी होती है।इतनी ठण्ड कि नींद खुलने से पहले हीशरीर काँपने लगता है।
अभी अंधेरा रहता है।बाहर कोहरा छाया होता है।हाथ रज़ाई से बाहर निकालने मेंडर लगता है।
लेकिन उठना पड़ता है।क्योंकि अगर मैं नहीं उठातो उस दिन घर में चूल्हा नहीं जलेगा।
मेरे कपड़े और मेरी ठण्ड
मेरे पासकोई मोटा जैकेट नहीं है।
एक पुराना स्वेटर है,जिसमें कई जगह से हवा घुसती है।
कभी-कभीमैं उसी स्वेटर कोदो बार लपेट लेता हूँ।
हाथों में दस्ताने नहीं,पैरों में पुराने चप्पल।
ठण्ड मेंरिक्शे की हैंडल पकड़ते हीहाथ सुन्न हो जाते हैं।
मेरा घर और परिवार
मैं झुग्गी में रहता हूँ।
एक छोटा-सा कमरा,टीन की छत।
रात को ठण्डछत से उतरकरसीधे शरीर में घुस जाती है।
मेरी पत्नीसुबह उठकरचूल्हा जलाने की कोशिश करती है।
गीली लकड़ी सेधुआँ निकलता है,आँखें जलती हैं।
बच्चेएक-दूसरे से सटकरसोते रहते हैं।
बच्चों को देखकर मन भारी हो जाता है
मेरी बेटीरात में खाँसती रहती है।
मैं सोचता हूँ —अगर बीमार पड़ गईतो दवा कहाँ से लाऊँगा?
बेटा पूछता है:
“पापा, आज स्कूल जाऊँ?”
मैं कहता हूँ:
“जाओ बेटा”
लेकिन मन में डर रहता हैकि कहीं ठण्ड सेउसे कुछ हो न जाए।
रिक्शा निकालना – सबसे मुश्किल काम
सुबह जब मैंरिक्शा निकालता हूँतो सबसे पहलेउसकी सीट पर जमी ओस हटाता हूँ।
रिक्शा भीठण्ड मेंजैसे बोझिल हो जाता है।
पहली सवारी मिलने तकपैर जमने लगते हैं।
कई बारसड़क पर खड़ा रहता हूँ,लेकिन कोई बुलाता नहीं।
गरीब आदमी के घर की सच्ची कहानी | एक मजदूर का घर, परिवार और रोज़ की ज़िंदगी
सवारी और मेरी उम्मीद
जब कोई सवारी मिल जाती हैतो मन में थोड़ी राहत आती है।
लेकिन ठण्ड मेंलोग कम निकलते हैं।
जो निकलते हैंवे कम पैसे देते हैं।
कभी-कभीकोई कह देता है:
“इतने में ही ले चलो”
मैं मना नहीं कर पाता।
क्योंकि मना कियातो शायदअगली सवारी न मिले।
ठण्ड और शरीर का दर्द
दिन चढ़ने के बाद भीठण्ड कम नहीं होती।
पैरों मेंदर्द होने लगता है।
पीठ अकड़ जाती है।
लेकिन मैं रुक नहीं सकता।
रिक्शेवाले का शरीरउसकी रोज़ी होता है।
अगर शरीर बैठ गयातो ज़िंदगी रुक जाएगी।
दोपहर – जब पेट जलता है
दोपहर कोअक्सर पेट खाली रहता है।
कभी-कभीचाय पी लेता हूँ।
चाय से ठण्ड थोड़ी कम होती है,लेकिन भूख नहीं जाती।
मैं सोचता हूँ —शाम तककुछ कमा लूँतो घर ले जाऊँ।
शाम की ठण्ड और थकान
शाम होते-होतेठण्ड फिर तेज़ हो जाती है।
हाथ काँपते हैं।
आँखें थक जाती हैं।
लेकिन घर जाने से पहलेएक-दो सवारी और देखने की कोशिश करता हूँ।
क्योंकि बच्चों के लिएकुछ तो ले जाना है।
घर लौटना
जब मैं घर लौटता हूँतो पत्नी मेरे चेहरे को देखती है।
वह पूछती नहीं —आज कितना कमाया?
वह समझ जाती है।
अगर पैसे कम होंतो वह भी कम खाती है।
रात का खाना
रात कोसादा खाना होता है।
कभी सिर्फ़ रोटी,कभी नमक के साथ।
बच्चे पहले खाते हैं।
मैं आख़िर में।
ठण्ड मेंगरम रोटीसबसे बड़ी राहत होती है।
रात का डर और सोच
रात कोमैं देर तक जागता हूँ।
सोचता हूँ —कल ठण्ड और बढ़ गईतो क्या करूँगा?
अगर मैं बीमार पड़ गयातो घर कैसे चलेगा?
गरीब आदमीठण्ड से नहीं,भविष्य से ज़्यादा काँपता है।
मेरी छोटी-सी दुआ
मैं भगवान सेबड़ा कुछ नहीं माँगता।
बस यही चाहता हूँ:
ठण्ड थोड़ी कम रहे
मुझे रोज़ सवारी मिले
मेरे बच्चे स्वस्थ रहें
मेरी कहानी क्यों लिखी
मैंने यह कहानीइसलिए लिखीताकि लोग जानेंठण्ड मेंरिक्शेवाले की ज़िंदगीकितनी मुश्किल होती है।
हम भी इंसान हैं।बस हमारी ठण्डज़्यादा चुभती है।
आख़िरी बात
अगर आपकभी ठण्ड मेंकिसी रिक्शेवाले को देखें,तो उसे नज़रअंदाज़ मत करना।
शायद वहीअपने परिवार कीइकलौती गर्मी हो।

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