गरीब आदमी के घर की सच्ची कहानी | एक मजदूर का घर, परिवार
मेरा घर
मेरा घर बहुत छोटा है।लोग इसे घर नहीं, झोपड़ी कहते हैं।
चार दीवारें हैं,लेकिन मजबूत नहीं।
छत टीन की है।गर्मी में आग जैसी गरम,बरसात में ढोल जैसी आवाज़ करती है।
जब हवा तेज़ चलती हैतो मुझे डर लगता है —कहीं आज छत उड़ न जाए।
पर यही घर हैजहाँ मेरा परिवार सांस लेता है।
सुबह – जब घर जागता है
मेरे घर में सुबह जल्दी हो जाती है।
अंधेरा रहता है,लेकिन पत्नी उठ जाती है।
चूल्हा जलाने की आवाज़मेरी नींद खोल देती है।
घर में घड़ी नहीं,हम समय सूरज से जानते हैं।
बच्चे अभी सो रहे होते हैं।ज़मीन पर बिछे पुराने बोरेही उनका बिस्तर हैं।
गरीब आदमी की परिवार की सच्ची कहानी | एक पिता की रोज़ की ज़िंदगी और संघर्ष
मेरी पत्नी और घर का काम
मेरी पत्नीहर दिन वही काम करती है।
पानी भरना,चूल्हा जलाना,बच्चों के कपड़े देखना,घर को समेटना।
उसके पास आराम नाम की चीज़ नहीं।
वह कभी नहीं कहती —“मैं थक गई हूँ”
लेकिन मैं देखता हूँउसकी आंखों में थकान।
घर की हालत
घर की दीवारों परसीलन जमी रहती है।
बरसात मेंपानी अंदर घुस आता है।
हम बाल्टी रख देते हैं।
बच्चे पूछते हैं —“पापा, हमारे घर में पानी क्यों टपकता है?”
मैं हँस देता हूँ।
क्योंकिजवाब मेरे पास नहीं होता।
बच्चों की दुनिया
मेरे बच्चों की दुनियाबहुत छोटी है।
स्कूल, घर और गली।
खिलौने कम हैं,लेकिन सपने बड़े हैं।
बेटा कहता है —“पापा, मैं बड़ा होकर अफसर बनूँगा”
मैं सिर हिला देता हूँ।
मन में डर भी होता हैऔर खुशी भी।
काम पर जाने से पहले
काम पर जाने से पहलेमैं हाथ-मुंह धोता हूँ।
शीशा नहीं है,लेकिन पानी में चेहरा देख लेता हूँ।
कपड़े पुराने हैं,फटे भी हैं।
पर मैं उन्हें पहनता हूँक्योंकि काम तो इन्हीं से चलता है।
रोज़गार की चिंता
हर दिन काम नहीं मिलता।
कभी मिलता है,कभी नहीं।
जब काम नहीं मिलतातो घर का बोझऔर भारी लगने लगता है।
मैं घर लौटता हूँतो पत्नी कुछ नहीं पूछती।
वह समझ जाती है।
जब काम मिलता है
काम मिले तोदिन भर ईंट ढोता हूँ।
सीमेंट उठाता हूँ।
हाथ छिल जाते हैं,पीठ दर्द करती है।
पर दिमाग मेंएक ही बात रहती है —आज घर में खाना बनेगा।
घर लौटना
शाम कोजब मैं घर लौटता हूँतो बच्चे दौड़कर आते हैं।
मेरी थकानउनके गले लगते हीथोड़ी कम हो जाती है।
पत्नी मेरे चेहरे को देखती है,जेब को नहीं।
घर का खाना
हमारे घर का खानासादा होता है।
कभी रोटी-नमक,कभी दाल।
सबसे पहले बच्चे खाते हैं।
मैं आख़िर में।
क्योंकि पिताहमेशा आख़िर में खाता है।
रात और मेरा मन
रात कोसब सो जाते हैं।
मैं देर तक जागता हूँ।
घर की छत को देखता हूँ।
सोचता हूँ —अगर कल काम नहीं मिलातो क्या होगा?
गरीब आदमीहर रातकल की चिंता लेकर सोता है।
बीमारी का डर
अगर घर में कोई बीमार पड़ेतो डर लगने लगता है।
दवा महंगी है,डॉक्टर दूर है।
कई बारदुआ ही इलाज बन जाती है।
त्योहार और गरीबी
त्योहार भी आते हैं।
लेकिन हमारे घरखुशी थोड़ी कम होती है।
नए कपड़े नहीं,बस साफ कपड़े।
फिर भी बच्चे खुश रहते हैं।
मेरा सपना
मैं अमीर नहीं बनना चाहता।
मैं बस चाहता हूँ:
मेरा घर पक्का हो
छत से पानी न टपके
बच्चों को पढ़ाई मिले
इतना काफी है।
मेरी ज़िंदगी का सच
गरीबी सिर्फ़ पैसे की कमी नहीं।
गरीबी है —हर दिन समझौता,हर दिन डर,हर दिन उम्मीद।
मैंने यह कहानी क्यों लिखी
मैंने यह कहानीइसलिए लिखीताकि लोग समझेंगरीब आदमी भीदिल रखता है।
हम भी हँसते हैं,रोते हैं,सोचते हैं।
आख़िरी बात
अगर आपनेयह कहानी पढ़ीतो शायदआप किसी गरीब के घर कोअलग नज़र से देखेंगे।
हमारे घर छोटे हैं,लेकिन हमारी ज़िम्मेदारियाँबहुत बड़ी हैं।

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