गरीब घर का लड़का बना IAS अफसर की कहानी
कहानी
मेरा नाम रवि है। लोग आज मुझे “रवि कुमार, IAS” कहते हैं, पर सच बताऊँ तो मुझे आज भी अपना पुराना नाम ज्यादा सच्चा लगता है — “ओए रिक्शेवाले का लड़का”।
मैं किसी बड़े घर में पैदा नहीं हुआ था। हमारा घर घर नहीं था, बस टीन की छत, प्लास्टिक की चादर और मिट्टी की दीवारों का एक कमरा था। बरसात में पानी टपकता था, गर्मी में अंदर भट्टी जैसा लगता था और सर्दी में हवा सीधे हड्डी तक घुस जाती थी।
मेरे पिताजी रिक्शा चलाते थे। सुबह अंधेरा रहते घर से निकल जाते, रात को थके हुए लौटते। उनकी हथेलियाँ इतनी सख्त हो गई थीं कि जैसे पत्थर हो। माँ लोगों के घर बर्तन माँजती थी। कई बार वो बची हुई रोटियाँ कपड़े में बाँधकर लाती थी। वही हमारा खाना होता था।
मैंने बचपन से खिलौने नहीं देखे, बस जिम्मेदारी देखी।
स्कूल की पहली लड़ाई – भूख
मुझे याद है, जब मैं पहली बार स्कूल गया। मेरी कमीज किसी और बच्चे की पुरानी थी। पैंट घुटनों से ऊपर थी। चप्पल अलग-अलग जोड़ी की। बच्चे हँस रहे थे।
“अरे देखो, ये तो झुग्गी वाला है…”
मुझे समझ नहीं आता था हँसी क्यों उड़ा रहे हैं, पर सीने में कुछ चुभता था।
दोपहर में मिड-डे मील मिलता था। कई बच्चे खाना छोड़ देते थे, पर मैं प्लेट चाटकर खाता था। कई बार शर्म भी आती थी, पर भूख शर्म से बड़ी होती है।
पिता का सपना
एक रात पिताजी बहुत चुप थे। मैंने पूछा,“बाबा, क्या हुआ?”
उन्होंने कहा,“रवि, मैं चाहता हूँ तू मेरी तरह रिक्शा ना चलाए। पढ़ लिख जाए तो जिंदगी बदल जाती है।”
मैंने पूछा,“पढ़ने से क्या होता है?”
उन्होंने कहा,“पढ़ने से आदमी छोटा नहीं रहता।”
उस दिन पहली बार लगा कि शायद पढ़ाई सच में बड़ी चीज होती है।
गरीब मजदूर का कच्चा घर | परिवार, जिम्मेदारी और ज़िंदगी की सच्चाई
पढ़ाई या काम?
जब मैं 8वीं में था, घर की हालत और खराब हो गई। पिताजी बीमार पड़ गए। रिक्शा चलाना कम हो गया। घर में राशन खत्म। माँ रोती थी, पर छुपकर।
मैंने एक दिन कहा,“माँ, मैं पढ़ाई छोड़ देता हूँ, काम कर लूँगा।”
माँ ने मुझे जोर से डाँटा,“अगर तू भी काम पर चला गया ना, तो हमारी गरीबी कभी खत्म नहीं होगी। तू पढ़ेगा। चाहे मैं भूखी रहूँ।”
माँ की आँखों में आँसू थे, पर आवाज पत्थर जैसी सख्त।
लालटेन की रोशनी
हमारे घर में बिजली नहीं थी। मैं स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ता था। कई बार कुत्ते भौंकते, लोग घूरते, पर मैं किताब से नजर नहीं हटाता था।
एक बार मोहल्ले के अंकल बोले,“क्यों रे, कलेक्टर बनेगा क्या?”
मैंने हँसकर कहा,“हाँ, बनूँगा।”
सब हँसे। पर उस दिन पहली बार मेरे मन में “कलेक्टर” शब्द अटक गया।
पहली बड़ी हार
10वीं बोर्ड का रिजल्ट आया। मैं फेल हो गया।
उस दिन लगा सब खत्म। घर नहीं गया। नदी किनारे बैठा रहा। सोचा, “हम जैसे लोगों के बस का नहीं ये सब।”
घर पहुँचा तो माँ दरवाजे पर बैठी थी। बोली,“फेल हो गया?”
मैंने सिर झुका लिया।
माँ बोली,“फेल पढ़ाई में हुआ है, जिंदगी में नहीं। फिर से देगा पेपर।”
माँ पढ़ी लिखी नहीं थी, पर उससे बड़ी टीचर मैंने नहीं देखी।
दूसरी कोशिश
मैंने दुगनी मेहनत की। सुबह अखबार बाँटता, दिन में स्कूल, शाम को चाय की दुकान पर काम, रात को पढ़ाई।
इस बार 10वीं में अच्छे नंबर आए। स्कूल के मास्टर जी ने कहा,“रवि, तू आगे जा सकता है।”
पहली बार किसी ने मुझ पर भरोसा किया था।
IAS का नाम पहली बार
12वीं के बाद समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ। एक दिन लाइब्रेरी में अखबार पढ़ रहा था। उसमें लिखा था — “एक गरीब किसान का बेटा बना IAS अधिकारी।”
मैंने मास्टर जी से पूछा,“IAS क्या होता है?”
उन्होंने बताया,“देश चलाने वाले अफसर। जिलाधिकारी, कलेक्टर — वही।”
मेरे कान में बस एक ही बात गूँजी — रिक्शेवाले का बेटा भी बन सकता है?
शहर की जंग
मैं शहर गया तैयारी करने। रहने को जगह नहीं थी। एक मंदिर के पीछे कमरा मिला, चार लड़कों के साथ। फर्श पर सोते थे।
कोचिंग की फीस नहीं थी। मैं लाइब्रेरी में बैठकर पुरानी किताबों से पढ़ता। नोट्स दूसरों से माँगकर कॉपी करता।
कई बार पेट में दर्द होता था — भूख से।
मज़ाक और अपमान
एक बार कोचिंग के बाहर लड़के बात कर रहे थे,“IAS की तैयारी गरीब लोग क्यों करते हैं? ये उनके बस की नहीं।”
मैं पास खड़ा था। मन में आग लगी। उस दिन तय किया — अब पीछे नहीं हटना।
पहली परीक्षा – असफल
UPSC का पहला एग्जाम दिया। फेल।
दूसरा साल — फिर फेल।
तीसरे साल घर से फोन आया,“अब छोड़ दे बेटा, बहुत हो गया।”
पिताजी की आवाज कमजोर थी। मैंने कहा,“बाबा, बस एक बार और।”
आखिरी दांव
मैंने खुद को कमरे में बंद कर लिया। मोबाइल बंद। दोस्तों से दूरी। बस किताब, दीवार और मैं।
हर दिन खुद से कहता,“तू रिक्शेवाले का बेटा है, हारना तेरे लिए महंगा है।”
रिजल्ट का दिन
रिजल्ट वाले दिन हाथ काँप रहे थे। लिस्ट खोली। नाम ढूँढ रहा था।
“रवि कुमार…”
मैं स्क्रीन को देखता रह गया। यकीन नहीं हुआ। फिर जोर से रो पड़ा।
मेरे साथ रहने वाले लड़के बोले,“अरे पागल, तू IAS बन गया!”
घर वापसी
मैं घर पहुँचा। वही झोपड़ी, वही गली। माँ बाहर बैठी थी। मुझे देखकर बोली,“आ गया?”
मैंने कहा,“माँ, मैं अफसर बन गया।”
माँ समझी नहीं। मैंने कहा,“अब आपको बर्तन नहीं माँजने पड़ेंगे।”
माँ रोने लगी। पिताजी ने मेरा चेहरा पकड़कर कहा,“आज मेरा रिक्शा हल्का हो गया।”
आज
आज मेरे पास बड़ा घर है, गाड़ी है, लोग सलाम करते हैं। पर जब भी किसी रिक्शेवाले को देखता हूँ, लगता है — वो मैं ही हूँ।
मैं आज भी भूख नहीं भूल पाया। अपमान नहीं भूल पाया। माँ के आँसू नहीं भूला।
मैं बस इतना जानता हूँ —गरीबी गुनाह नहीं है।हार मान लेना गुनाह है।
अगर एक रिक्शेवाले का बेटा IAS बन सकता है, तो कोई भी बन सकता है। फर्क बस इतना है — कोई दर्द देखकर रुक जाता है, कोई दर्द को सीढ़ी बना लेता है।




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