राजा और रानी और राजकुमारी कहानी
एक भव्य, प्रेरणादायक और रहस्यमयी हिंदी परी-कथा
बहुत समय पहले की बात है। हिमालय की तराइयों और घने साल वनों के बीच बसा था सूर्यगढ़—एक ऐसा राज्य जहाँ सुबह की पहली किरण महल के शिखरों पर पड़ते ही सोने-सी चमक बिखेर देती थी। सूर्यगढ़ का नाम ही उसकी पहचान था—यहाँ न्याय सूरज की तरह उजला था और अन्याय अँधेरे की तरह दूर।
इस राज्य पर शासन करते थे राजा आदित्यवर्धन—वीर, न्यायप्रिय और प्रजा-वत्सल। उनके साथ थीं रानी पद्मावती—बुद्धिमती, करुणामयी और दूरदर्शी। दोनों का दाम्पत्य प्रेम और सम्मान का ऐसा उदाहरण था, जिसकी कहानियाँ दूर-दूर तक कही जाती थीं। वर्षों बाद उनके जीवन में आई एक नन्ही-सी रोशनी—राजकुमारी अनन्या।
अनन्या के जन्म के दिन पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। ढोल-नगाड़ों की गूँज, पुष्प-वर्षा और दीपों की कतारों से सूर्यगढ़ जगमगा उठा। राजज्योतिषी ने भविष्यवाणी की—“यह बालिका राज्य का गौरव बढ़ाएगी, पर इसका मार्ग परीक्षा और त्याग से होकर जाएगा।” राजा-रानी ने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार किया।
बचपन की परछाइयाँ
अनन्या बचपन से ही अलग थी। उसे तलवार और ग्रंथ—दोनों से प्रेम था। जहाँ अन्य राजकुमारियाँ आभूषणों में रमतीं, अनन्या पुस्तकालय में बैठकर इतिहास पढ़ती और प्रांगण में घुड़सवारी करती। रानी पद्मावती उसे संयम सिखातीं, तो राजा आदित्यवर्धन उसे साहस का पाठ पढ़ाते।
महल के बाहर, नगर के कोलाहल में, एक और जीवन पल रहा था—वीरसेन। वह एक साधारण लोहार का पुत्र था, पर उसकी आँखों में स्वप्न असाधारण थे। उसकी हथेलियों में मेहनत की रेखाएँ थीं और मन में न्याय की आग। वह अनन्या का हमउम्र था, पर उनके रास्ते अलग-अलग थे—कम से कम तब तक।
राज्य पर मंडराता संकट
समय बदला। सूर्यगढ़ की समृद्धि ने पड़ोसी राज्य कालकेतु की आँखों में ईर्ष्या भर दी। कालकेतु का शासक महाबल—क्रूर, कपटी और सत्ता का भूखा—सूर्यगढ़ को हथियाने का षड्यंत्र रचने लगा। उसने व्यापारिक मार्गों पर डकैती बढ़वाई, सीमाओं पर उकसावे किए और भीतर से राज्य को कमजोर करने के लिए भेदिए भेजे।
राजसभा में चिंता छा गई। राजा आदित्यवर्धन ने संयम रखा, पर रानी पद्मावती को आभास हो गया—यह युद्ध केवल तलवारों का नहीं, बुद्धि और धैर्य का भी होगा।
राजकुमारी का निर्णय
एक रात अनन्या ने महल की छत से दूर क्षितिज को देखा। उसे लगा मानो अँधेरा धीरे-धीरे बढ़ रहा हो। उसी क्षण उसने निश्चय किया—“यदि संकट राज्य पर है, तो उत्तरदायित्व भी मेरा है।”
उसने राजा-रानी से युद्ध-कौशल और कूटनीति सीखने की अनुमति माँगी। राजा ने पहले संकोच किया, पर रानी की आँखों में विश्वास था। “जिसे नेतृत्व करना है, उसे सत्य का भार उठाना ही होगा,” रानी ने कहा।
वीरसेन से भेंट
एक दिन नगर में आग लग गई। अफरा-तफरी मच गई। अनन्या स्वयं सहायता के लिए पहुँची। वहीं उसकी भेंट वीरसेन से हुई—जो बिना किसी भय के लोगों को सुरक्षित निकाल रहा था। उनकी आँखें मिलीं—सम्मान और दृढ़ता की भाषा बोलती हुई।
अनन्या ने जाना—नेतृत्व महल की दीवारों तक सीमित नहीं। वीरसेन ने जाना—राजकुमारी होना और मनुष्यता रखना, दोनों साथ हो सकते हैं।
षड्यंत्र का जाल
कालकेतु के भेदिए पकड़े गए। पूछताछ में पता चला—महाबल सूर्यगढ़ पर अचानक आक्रमण की योजना बना रहा है। राजा आदित्यवर्धन ने सेना को सतर्क किया। रानी पद्मावती ने नगर में अन्न-भंडार और चिकित्सा व्यवस्था मजबूत करवाई।
अनन्या ने प्रस्ताव रखा—सीमावर्ती गाँवों से संवाद बढ़ाया जाए, ताकि अफवाहें न फैलें। यह विचार सफल रहा।
युद्ध की आहट
आक्रमण हुआ। रणभूमि धूल और ध्वनि से भर गई। राजा ने अग्रिम पंक्ति संभाली। रानी ने भीतर से रणनीति। अनन्या ने संदेशवाहक दल का नेतृत्व किया—तेज़, सटीक और निर्भीक।
वीरसेन लोहार की भट्टी छोड़ सैनिकों के साथ खड़ा हुआ—उसकी बनाई तलवारें न्याय के पक्ष में उठीं।
परीक्षा की घड़ी
युद्ध लंबा खिंच गया। एक छल में राजा घायल हो गए। राज्य का मनोबल डगमगाया। उसी रात अनन्या ने सभा बुलाई। उसकी आवाज़ में कंपकंपी नहीं थी—केवल संकल्प। “जब तक सूरज उगेगा, सूर्यगढ़ खड़ा रहेगा।”
रानी पद्मावती ने उसका हाथ थामा—“आज से तुम केवल राजकुमारी नहीं, आशा हो।”
निर्णायक मोड़
अनन्या ने वीरसेन के साथ मिलकर एक साहसी योजना बनाई—महाबल की आपूर्ति रेखाएँ काट दी जाएँ। जोखिम बड़ा था, पर समय कम।
रात के अँधेरे में, वे निकल पड़े। जंगल, नदियाँ, पहरे—सब पार किए। योजना सफल हुई। कालकेतु की सेना बिखर गई।
विजय और क्षमा
महाबल पराजित हुआ। उसे बंदी बनाकर लाया गया। राजा आदित्यवर्धन ने क्षमा का मार्ग चुना—शर्तों के साथ। “सत्ता भय से नहीं, न्याय से टिकती है।”
राज्य में शांति लौटी।
उत्तरदायित्व का हस्तांतरण
राजा स्वस्थ हुए, पर उन्होंने समझ लिया—समय परिवर्तन का है। अनन्या को उत्तराधिकारी घोषित किया गया। रानी ने उसे राज्य-धर्म की अंतिम सीख दी—“न्याय में करुणा और करुणा में दृढ़ता।”
वीरसेन को सेना में सम्मान मिला—पर उसने पद से अधिक सेवा चुनी।
नया सवेरा
राज्याभिषेक के दिन सूरज पहले से अधिक उजला था। अनन्या ने सिंहासन संभाला—निडर, विनम्र और दूरदर्शी। सूर्यगढ़ ने एक नई कथा लिखी—जहाँ राजा का साहस, रानी की बुद्धि और राजकुमारी का संकल्प एक होकर इतिहास बने।
और लोग आज भी कहते हैं—“जब नेतृत्व सच्चा हो, तो परी-कथाएँ हकीकत बन जाती हैं।”
सीख: शक्ति तभी सुंदर है, जब उसके साथ करुणा हो; और उत्तरदायित्व तभी महान, जब उसे बाँटा जाए।
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