अकेली लड़की और सुनसान सड़क
(एक रहस्यमयी और प्रेरणादायक हिंदी परी-कथा)
शाम ढल रही थी।सूरज की आख़िरी किरणें पेड़ों की टहनियों के बीच फँसकर ज़मीन पर अजीब-सी परछाइयाँ बना रही थीं। हवा में सन्नाटा था, ऐसा सन्नाटा जिसमें अपनी ही साँसों की आवाज़ डराने लगती है।
उस सुनसान सड़क पर आर्या अकेली चल रही थी।
यह सड़क शहर को उसके गाँव से जोड़ती थी—सीधी, लंबी और दिन में भी कम चलने वाली। शाम के बाद तो यहाँ इंसान कम और डर ज़्यादा दिखाई देता था। लोग कहते थे,“उस सड़क पर मत जाया करो, वहाँ कुछ ठीक नहीं है।”
लेकिन आर्या के पास कोई और रास्ता नहीं था।
उसकी माँ बीमार थी। शहर के अस्पताल से दवाइयाँ लेकर लौटते समय आख़िरी बस छूट चुकी थी। टैक्सी वाले ने इस रास्ते पर जाने से साफ़ मना कर दिया था।“बहन, जान प्यारी है तो उस सड़क से मत जाओ,” उसने डरते हुए कहा था।
आर्या ने मजबूर होकर पैदल ही चलना चुना।
डर की पहली आहट
सड़क के दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे। उनकी टहनियाँ ऐसे फैली थीं मानो किसी को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ा रही हों।चलते-चलते आर्या को लगा जैसे कोई उसके पीछे चल रहा हो।
उसने पलटकर देखा—कुछ नहीं।
उसने खुद को समझाया,“डर मत आर्या, ये बस तुम्हारा वहम है।”
लेकिन अगले ही पल उसे पीछे से किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई दी।
टक… टक… टक…
उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसने अपनी चाल तेज़ कर दी। कदमों की आवाज़ भी तेज़ हो गई।
अब डर साफ़-साफ़ महसूस हो रहा था।
पुरानी कहानी की याद
आर्या को अपनी दादी की बातें याद आ गईं।दादी कहा करती थीं,“इस सड़क पर बरसों पहले एक लड़की मरी थी। अकेली… बेसहारा… आज भी उसकी आत्मा रास्ता ढूँढती है।”
तभी हवा अचानक ठंडी हो गई।आर्या की रूह काँप उठी।
“नहीं… ये सब झूठ है,” उसने खुद से कहा।
लेकिन तभी सड़क के मोड़ पर उसे एक आकृति दिखाई दी।
एक लड़की…सफेद कपड़ों में…बाल चेहरे पर बिखरे हुए…
रहस्य का सामना
आर्या के कदम जैसे ज़मीन में गड़ गए।वह आकृति धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रही थी।
“क… कौन हो तुम?” आर्या की आवाज़ काँप रही थी।
वह लड़की रुकी।धीमे स्वर में बोली,“डर मत… मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी।”
उसकी आवाज़ में दर्द था। ऐसा दर्द जो बरसों से दबा हुआ हो।
आर्या ने हिम्मत जुटाई।“तुम… यहाँ क्यों हो?”
लड़की ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरा डरावना नहीं—बस बहुत उदास।
“मैं रास्ता ढूँढ रही हूँ,” उसने कहा।
सच की परतें
लड़की ने अपनी कहानी सुनानी शुरू की।
बरसों पहले वह भी आर्या की तरह अकेली इस सड़क से गुज़री थी। उसे मदद की ज़रूरत थी, लेकिन किसी ने नहीं सुना। इसी सड़क पर उसने दम तोड़ दिया।
“मैं आज भी यहीं भटकती हूँ,” उसने कहा,“क्योंकि मुझे किसी ने आख़िरी बार सहारा नहीं दिया।”
आर्या की आँखें भर आईं।उसे एहसास हुआ कि डर सिर्फ़ भूतों से नहीं, इंसानों की बेरुख़ी से भी पैदा होता है।
डर से दोस्ती तक
आर्या ने धीरे से कहा,“अगर मैं तुम्हारी मदद कर सकूँ तो?”
लड़की चौंक गई।“तुम… डरती नहीं हो?”
“डरती हूँ,” आर्या ने सच कहा,“लेकिन किसी को अकेला छोड़ देना उससे ज़्यादा डरावना है।”
उस पल हवा थम गई।पेड़ों की सरसराहट शांत हो गई।
लड़की के चेहरे पर पहली बार हल्की-सी मुस्कान आई।
मुक्ति का रास्ता
उसने आर्या से बस एक गुज़ारिश की—“मेरी कहानी लोगों तक पहुँचा देना। ताकि कोई और लड़की इस सड़क पर अकेली न मरे।”
आर्या ने वादा किया।
अचानक तेज़ रोशनी हुई।जब रोशनी कम हुई, वहाँ कोई नहीं था।
सड़क अब पहले जैसी डरावनी नहीं लग रही थी।
नई सुबह
आर्या गाँव पहुँची। माँ को दवा दी। सब ठीक हो गया।
कुछ दिनों बाद उसने गाँव वालों को उस सड़क की कहानी सुनाई। प्रशासन ने वहाँ लाइटें लगवाईं, पुलिस गश्त शुरू हुई।
अब वह सड़क फिर से ज़िंदा हो गई थी।
कहानी की सीख
आर्या समझ चुकी थी—डर हमेशा अँधेरे में नहीं होता।कभी-कभी वह चुप्पी में होता है,और साहस सिर्फ़ भागने में नहीं,किसी का दर्द सुनने में भी होता है।
आज भी लोग कहते हैं,उस सड़क पर अब कोई भूत नहीं दिखता…शायद इसलिए क्योंकि किसी ने उसकी कहानी सुन ली थी।
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