जो चाहोगे, सो पाओगे
बहुत पुराने समय की बात है।भारत के एक शांत, साधारण से गाँव में अमृतलाल नाम का एक व्यक्ति रहता था।वह न बहुत गरीब था, न बहुत अमीर—बस ज़िंदगी जैसे-तैसे चल रही थी।
अमृतलाल की सबसे बड़ी समस्या थी उसकी सोच।
वह हमेशा शिकायत करता रहता—“मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?”“दूसरों के पास सब कुछ है, मेरे पास कुछ नहीं।”“मेरी किस्मत ही खराब है।”
उसके घर में पत्नी सावित्री, एक बेटा रोहन और एक बेटी मीरा थी।सावित्री शांत स्वभाव की थी, मेहनती थी, और हालात में भी खुश रहने की कोशिश करती थी।लेकिन अमृतलाल की नकारात्मक बातें धीरे-धीरे घर के माहौल को भी भारी बना देती थीं।
हर दिन वही शिकायत
सुबह उठते ही अमृतलाल कहता,“आज भी काम मिलेगा या नहीं, पता नहीं।”
काम मिल जाए तो कहता,“इतनी मेहनत के बाद भी इतना कम पैसा!”
काम न मिले तो,“देखो, मेरी किस्मत!”
सावित्री समझाती,“जो है उसी में खुश रहना सीखो। कोशिश करते रहो।”
लेकिन अमृतलाल का जवाब हमेशा एक-सा होता—“तुम नहीं समझोगी।”
गाँव में कुछ लोग अमृतलाल से कम पढ़े-लिखे थे,लेकिन आज वे आगे बढ़ चुके थे।अमृतलाल उन्हें देखकर और ज्यादा जलता।
उसके मन में एक ही बात बैठ चुकी थी—“ज़िंदगी ने मेरे साथ अन्याय किया है।”
रहस्यमयी साधु का आगमन
एक दिन गाँव में खबर फैली कि पास के जंगल के किनारे एक रहस्यमयी साधु आया है।लोग कहते थे, वह साधु बहुत अद्भुत है।उसके पास जाने वाला व्यक्ति वही पाता है जो वह सच में चाहता है।
कुछ लोग हँसते,“अरे, ये सब कहानियाँ हैं।”
कुछ लोग डरते,“पता नहीं कौन सा साधु है।”
लेकिन अमृतलाल के मन में एक उम्मीद जगी।उसने सोचा—“अगर सच में ऐसा है, तो मेरी सारी परेशानियाँ खत्म हो सकती हैं।”
अगली सुबह वह जंगल की ओर निकल पड़ा।
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साधु से पहली मुलाकात
जंगल के भीतर एक बड़े पीपल के पेड़ के नीचे वह साधु बैठा था।सफेद दाढ़ी, शांत चेहरा, और आँखों में गहरी चमक।
अमृतलाल ने झिझकते हुए कहा,“बाबा, सुना है आप मनचाही चीज़ दिला सकते हैं।”
साधु मुस्कराया।“मैं कुछ नहीं देता, बेटा।मैं सिर्फ़ वही देता हूँ… जो तुम सच में चाहते हो।”
अमृतलाल उत्साहित हो गया।“तो मुझे अमीर बना दीजिए।मैं सुख-शांति चाहता हूँ।”
साधु ने आँखें बंद कीं, फिर बोला,“एक शर्त है।”
“शर्त?” अमृतलाल चौंका।
“हाँ।आज रात तुम जो चाहोगे, वही तुम्हें मिलेगा—लेकिन याद रखना, तुम्हारी हर इच्छा तुम्हारी सोच से जन्म लेगी।”
अमृतलाल ने बिना सोचे हामी भर दी।
पहली रात – डर का परिणाम
उस रात अमृतलाल अपने घर लौटा।बिस्तर पर लेटते ही उसके मन में विचार आने लगे—
“अगर मैं अमीर न बन पाया तो?”“अगर सब झूठ हुआ तो?”“अगर मेरे साथ कुछ बुरा हो गया तो?”
धीरे-धीरे वह डरते-डरते सो गया।
अचानक रात में तेज़ आवाज़ हुई।बाहर आंधी, बारिश, बिजली की चमक!घर की छत से पानी टपकने लगा।
अमृतलाल घबरा गया।उसे लगा जैसे सारी दुनिया उसके खिलाफ़ हो गई हो।
सुबह हुई तो उसने देखा—खेत में नुकसान,मवेशी डर गए,काम का नुकसान।
वह चिल्लाया,“ये क्या हुआ?!”
उसे याद आया—“जो चाहोगे, सो पाओगे…”
साधु की बात का असर
दूसरे दिन वह फिर साधु के पास गया।
“बाबा! आपने तो मेरी हालत और खराब कर दी।”
साधु शांत स्वर में बोला,“मैंने वही दिया, जो तुमने चाहा—तुमने डर चाहा, तो डर मिला।”
अमृतलाल चुप हो गया।
साधु ने आगे कहा,“आज फिर एक मौका है।आज रात ध्यान से सोचना—तुम सच में क्या चाहते हो?”
दूसरी रात – लालच की परीक्षा
उस रात अमृतलाल ने खुद से कहा,“मुझे बहुत सारा पैसा चाहिए।”
उसने सोचा—“सोना, ज़मीन, बड़ा घर, नौकर!”
वह इन्हीं खयालों में सो गया।
सुबह जब वह उठा,तो गाँव में अफरा-तफरी मची थी।
एक झगड़े में गाँव के दो गुट आमने-सामने थे।काम बंद।बाज़ार बंद।अराजकता।
उस दिन पैसा तो दूर,रोटी तक मुश्किल हो गई।
अमृतलाल को समझ आने लगा—सिर्फ़ चाहना काफी नहीं,चाहने का तरीका भी मायने रखता है।
तीसरी रात – सोच का परिवर्तन
अब अमृतलाल बहुत थक चुका था।उसने साधु की बातों को गहराई से सोचा।
रात को बिस्तर पर लेटकर उसने पहली बार खुद से पूछा—“मैं सच में क्या चाहता हूँ?”
पैसा?या… शांति?
उसने आँखें बंद कीं और सोचा—“मैं मेहनती बनना चाहता हूँ।”“मैं अपने परिवार को खुश देखना चाहता हूँ।”“मैं खुद पर विश्वास करना चाहता हूँ।”
उस रात वह बहुत शांति से सोया।
बदलाव की सुबह
सुबह उठते ही अमृतलाल को एक अलग ऊर्जा महसूस हुई।वह जल्दी उठा।सावित्री हैरान थी।
वह बोला,“आज मैं देर नहीं करूँगा।”
उसने काम ढूँढा।छोटा सा काम मिला,लेकिन उसने पूरी ईमानदारी से किया।
लोगों ने देखा—“आज अमृतलाल बदला-बदला सा है।”
दिन बीतते गए।अमृतलाल की सोच बदलती गई।वह शिकायत कम और प्रयास ज्यादा करने लगा।
धीरे-धीरे उसे ज्यादा काम मिलने लगा।उसकी इज़्ज़त बढ़ने लगी।
अंतिम मुलाकात
कुछ महीनों बाद अमृतलाल फिर साधु के पास गया।
“बाबा, अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए।”
साधु मुस्कराया।“अब तुम समझ गए हो।”
“हाँ,” अमृतलाल बोला,“जो हम सोचते हैं, वही हम बनते हैं।जो हम चाहते हैं, वही हमें मिलता है—लेकिन पहले हमें खुद को बदलना पड़ता है।”
साधु ने आशीर्वाद दिया,“अब तुम्हें किसी चमत्कार की ज़रूरत नहीं।”
और अगली ही पल…साधु वहाँ नहीं था।
जीवन की सच्ची जीत
अमृतलाल अमीर नहीं बना,लेकिन अब उसके घर में शांति थी।
बच्चे हँसते थे।सावित्री खुश थी।और अमृतलाल…खुद से संतुष्ट था।
वह जान चुका था—ज़िंदगी बाहर नहीं, अंदर से बदलती है।
कहानी की गहरी सीख
👉 जैसा सोचोगे, वैसा ही पाओगे👉 डर सोचोगे तो डर मिलेगा👉 लालच सोचोगे तो अशांति मिलेगी👉 सकारात्मक सोचोगे तो रास्ते खुद बनेंगे👉 चमत्कार बाहर नहीं, इंसान के भीतर होता है
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