सफलता की कहानी, जो दर्द से होकर गुज़री
मैं रिक्शेवाला हूँ — ये कहानी तब की है जब सपने भी उधार होते हैं
मैं ये कहानी लिख रहा हूँ,लेकिन सच ये है कि मुझे लिखना नहीं आता।मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी ज़िंदगीकभी किसी ब्लॉग में आएगी।हमारी ज़िंदगी तो बससुबह से शाम तक खिंचती रहती है।
मेरा नाम पूछोगे तो मैं नहीं बताऊँगा।क्योंकि रिक्शेवालों के नाम कम,नंबर ज़्यादा होते हैं।कभी “ए रिक्शा”,कभी “ओ भैया”,और कभी बिना नाम के गाली।
मैं जिस घर में रहता हूँ,उसे घर कहना भी शायद ज़्यादा है।चार दीवारें हैं,पर भरोसा नहीं कि बारिश में टिकेंगी।छत ऐसी कि ऊपर आसमान दिखता हैऔर नीचे ज़िंदगी।
सुबह उठते हीसबसे पहले छत देखता हूँ —आज टपकेगी या नहीं।फिर बच्चों की तरफ़ देखता हूँ —आज उनका पेट भरेगा या नहीं।
मेरे पिता भी रिक्शा चलाते थे।मैंने उन्हें कभी सीधे खड़े नहीं देखा।हमेशा थोड़े झुके हुए।जैसे ज़िंदगी के सामने झुकनाहमारी आदत बन गई हो।
वो कहते थे —“बेटा, मेहनत से मत डरना,लेकिन उम्मीद मत पाल लेना।”
तब समझ नहीं आया।अब हर दिन समझ आता है।
मैं स्कूल गया था।मन से गया था।कॉपी-किताब अच्छी लगती थी।लेकिन फीस नहीं लगती थी —वो तो ज़हर जैसी थी।
एक दिन मास्टर ने कहा —“फीस नहीं है तो मत आना।”
मैं नहीं गया।और फिर कभी नहीं गया।
उस दिनमैं बच्चा नहीं रहा।
पहली बार रिक्शा उठाया।पैर काँप रहे थे।हैंडल भारी था।और ज़िंदगी उससे भी भारी।
पहली कमाई — आठ रुपये।माँ को दिए।वो रोने लगी।
मैं समझ गया —अब ये रोनाअक्सर आएगा।
रिक्शा चलानाबस पैडल मारना नहीं होता।ये रोज़ अपने आप को समझाना होता हैकि तू अभी भी इंसान है।
गर्मी में सड़क जलती है।बरसात में इज़्ज़त भीगती है।और सर्दी में हड्डियाँ जवाब देती हैं।
लोग बैठते हैं,किराया पूछते हैं,और उतरते ही भूल जाते हैं।
लेकिन हम नहीं भूलते।क्योंकि हर सवारीएक रोटी होती है।
👉 (Part 2 में)शादी, बच्चे, बीमारी और वो रातेंजब लगा कि अब सब खत्म है…

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