बीवी, बच्चे और वो डर — जो हर रिक्शेवाले के सीने में रहता है
मैं रिक्शेवाला हूँ: एक गरीब आदमी की सच्ची दर्द भरी कहानी (Part 1)
शादी हुई।खुशी कम थी,डर ज़्यादा।
मैं सोच रहा था —मैं खुद को ठीक से नहीं चला पा रहा,किसी और की ज़िम्मेदारी कैसे लूँगा?
बीवी आई।सीधी, कम बोलने वाली।शायद मेरी ज़िंदगी देखकरउसने बोलना सीख ही नहीं पाया।
पहली रातहम दोनों देर तक बैठे रहे।बातें नहीं,चिंताएँ थीं।
पहला बच्चा हुआ।उसे गोद में लियातो डर लग गया।
मैं सोच रहा था —इसे मेरी ज़िंदगी क्यों मिली?
मैंने मेहनत बढ़ा दी।सुबह चार बजे निकलता,रात बारह बजे आता।
कभी-कभीइतना थक जाताकि खाना भी नहीं खाता।
बीवी पूछती —“कुछ खा लो।”
मैं कहता —“बच्चों को दे दो।”
वो समझ जाती।
एक दिन एक्सीडेंट हो गया।बाइक वाले ने टक्कर मारी।वो गाली देकर चला गया।
मैं सड़क पर पड़ा रहा।लोग देखते रहे।कोई नहीं रुका।
एक चायवाले ने पानी दिया।आज भी उसका चेहरा याद है।
तीन दिन काम नहीं कर पाया।तीन दिन घर मेंकुछ नहीं आया।
उस वक़्त समझ आया —गरीब बीमार नहीं पड़ सकता।
बच्चे बड़े होने लगे।स्कूल भेजना चाहता था।फीस बड़ी थी,मेरी जेब छोटी।
रात को रिक्शे पर बैठकरमैं अपने आप से बात करता था।
पूछता —“क्या यही आख़िर तक?”
जवाब नहीं आता था।
एक दिन एक सवारी बैठी।सूट-बूट में थी।
बोली —“मेरे पिता भी रिक्शा चलाते थे।उन्होंने मुझे पढ़ाया।आज मैं अफ़सर हूँ।”
उस दिनमैं घर आकरबहुत रोया।
और पहली बारमैंने सपना देखा।
👉 (Part 3 में)वो सपना, वो कुर्बानीऔर वो दिन जब लगा —शायद सब बेकार नहीं गया…

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