गरीब आदमी की परिवार की सच्ची कहानी | एक पिता की रोज़ की ज़िंदगी और संघर्ष
मेरी सुबह – जब सब सो रहे होते हैं
मेरी सुबह अंधेरे में शुरू होती है।घड़ी नहीं देखता,आँख अपने आप खुल जाती है।
चार बजते हीमन डर से जाग जाता है —अगर आज देर हो गईतो काम नहीं मिलेगा।
मैं धीरे से उठता हूँ।पैर रखते समयध्यान रखता हूँकि बच्चे जाग न जाएँ।
वे ज़मीन परएक-दूसरे से सटेसो रहे होते हैं।उनके चेहरे देखकरदिल भारी हो जाता है।
मैं सोचता हूँ —इन मासूमों कोमेरी गरीबीकितना झेलनी पड़ेगी?
मेरा घर – जिसे दुनिया झोपड़ी कहती है
हमारा घरएक ही कमरे का है।
टीन की छत,कच्ची दीवारें।
बरसात मेंछत से पानी टपकता है।गर्मी मेंदीवारें आग उगलती हैं।
पर यही घरमेरे परिवार कोएक साथ रखता है।
लोग इसे छोटा कहते हैं,मैं इसेअपनी पूरी दुनिया कहता हूँ।
मेरी पत्नी – मेरी सबसे बड़ी ताक़त
मेरी पत्नीहर दिन मुझसे पहले उठ जाती है।
चूल्हा जलाती है,कल के बचे चावल देखती है,सोचती हैआज क्या बनाया जाएजिससे बच्चों का पेट भर जाए।
वह कम बोलती है,लेकिन बहुत सहती है।
कभी शिकायत नहीं करती,कभी सवाल नहीं पूछती।
उसकी खामोशीमेरे लिएसबसे बड़ा बोझ है।
बच्चों की सुबह
मेरा बड़ा बेटास्कूल जाने की तैयारी करता है।
उसकी शर्टथोड़ी फटी है,जूते घिस चुके हैं।
एक दिन उसने कहा:
“पापा, सबके पास बैग नया है”
मैंने हँसकर कहा:
“ये भी ठीक है बेटा”
लेकिन अंदर सेकुछ टूट गया।
गरीब पिताहर दिनअपने दिल कोसमझाकर जीता है।
काम की तलाश
सुबह छह बजेमैं मज़दूरों के अड्डे पर पहुँचता हूँ।
मेरे जैसेऔर भी कई लोग।
सब चुप,सब इंतज़ार में।
ठेकेदार आता हैतो सबकी नज़रेंउसके मुँह पर टिक जाती हैं।
अगर नाम आ गयातो दिन बन जाता है।
अगर नहीं आयातो घर मेंखामोशी फैल जाती है।
जब काम नहीं मिलता
कई दिन ऐसे होते हैंजब पूरा दिनखड़े रहने के बादभी काम नहीं मिलता।
मैं घर लौटता हूँतो पत्नी कुछ नहीं पूछती।
वह बसचुपचापचूल्हे के पास बैठ जाती है।
उसकी चुप्पीमेरे लिएसबसे बड़ा सवाल होती है।
जब काम मिलता है
जब काम मिलता हैतो शरीर टूट जाता है।
ईंट उठाना,सीमेंट ढोना,धूप में खड़ा रहना।
हाथ छिल जाते हैं,पीठ दर्द से भर जाती है।
लेकिन मैं रुकता नहीं।
क्योंकिअगर मैं रुकातो मेरा परिवारभूखा रहेगा।
घर की शाम
शाम कोजब मैं घर लौटता हूँतो बच्चे दौड़करमुझसे लिपट जाते हैं।
उस एक पल मेंमेरी सारी थकानथोड़ी देर के लिएगायब हो जाती है।
मेरी पत्नीमेरी जेब नहीं देखती,मेरे चेहरे को देखती है।
रात का खाना
हमारा खानासादा होता है।
कभी दाल-पानी,कभी सिर्फ़ रोटी।
बच्चे पहले खाते हैं।मैं आख़िर में।
क्योंकि पिताहमेशा आख़िर में खाता है।
रात की सोच – मेरा मानस
सब सो जाते हैं।मैं जागता रहता हूँ।
सोचता हूँ —क्या मैं अपने बच्चों कोअच्छा भविष्य दे पाऊँगा?
क्या मेरी मेहनतकभी रंग लाएगी?
फिर खुद से कहता हूँ:
“कल फिर उठना है”
गरीब आदमीहार मानने काहक़ नहीं रखता।
बीमारी और डर
जब घर में कोई बीमार पड़ता हैतो सबसे ज़्यादा डर लगता है।
दवा का पैसा,डॉक्टर की फ़ीस।
कई बारमैं भगवान से कमदवा की दुकान सेज़्यादा डरता हूँ।
गरीबी का सच
गरीबी सिर्फ़पैसे की कमी नहीं होती।
गरीबी होती है —सपनों को दबाना,इच्छाओं को मारना,और हर दिनखुद को तोड़ना।
मेरी उम्मीद
मैं अमीर नहीं बनना चाहता।
मैं बस चाहता हूँ:
मेरे बच्चे पढ़ सकें
मेरी पत्नी सुरक्षित रहे
मुझे रोज़ काम मिले
क्या ये ज़्यादा माँग है?
मेरी कहानी क्यों लिखी
मैंने यह कहानीकिसी शोहरत के लिए नहीं लिखी।
मैंने इसे इसलिए लिखाताकि लोग जान सकेंकि गरीब आदमीभी इंसान होता है।
आख़िरी बात
अगर आपनेयह कहानी पूरी पढ़ लीतो शायदआप किसी गरीब कोनज़रअंदाज़ नहीं करेंगे।
हम भी इंसान हैं।बस हालातथोड़े भारी हैं।
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