गरीब आदमी की मज़दूरी की सच्ची कहानी | एक मजदूर की रोज़ की ज़िंदगी और संघर्ष

 एक गरीब मजदूर की सच्ची कहानी – रोज़ की मज़दूरी, दर्द और उम्मीद

गरीबी का असली सच: एक गरीब मजदूर की रोज़ की ज़िंदगी की कहानी


गरीब आदमी की मज़दूरी की कहानी
(मेरी ज़िंदगी, मेरे हाथों की मेहनत)
✍️ लिखने वाला: एक साधारण मज़दूर

सुबह – जब नींद नहीं, मजबूरी जगाती है
मेरी नींद घड़ी से नहीं खुलती।मेरी नींद पेट से खुलती है।
सुबह के चार बजते ही आँख खुल जाती है,क्योंकि दिमाग़ जानता है —अगर देर हुई,तो आज काम नहीं मिलेगा।
मैं चुपचाप उठता हूँ।मेरे पैर ज़मीन पर रखते हीठंड सी लगती है।फर्श कच्ची है,सीमेंट हमारे घर तक नहीं पहुँचा
एक कोने मेंमेरी पत्नी और बच्चे सो रहे होते हैं।मैं उन्हें देखता हूँऔर मन में सोचता हूँ —आज भी इनका पेट भर पाऊँगा या नहीं?

मेरा घर – जिसे लोग झोपड़ी कहते हैं
लोग इसे झोपड़ी कहते हैं,मैं इसे घर कहता हूँ
टीन की छत है,बारिश में पानी टपकता है।गर्मी में आग बरसती है।
एक ही कमरा है —उसी में सोना,उसी में खाना,उसी में सपने देखना
मेरी पत्नीचूल्हे पर चाय रखती है।चाय कम होती है,पानी ज़्यादा
लेकिन वो चायमेरे लिए ताक़त होती है।

बच्चों की सुबह
मेरा बेटाआँख मलते हुए पूछता है:
“पापा, आज काम मिलेगा?”
मैं हँसने की कोशिश करता हूँ
हां बेटा, मिलेगा।”
सच ये हैमुझे खुद नहीं पता
गरीब आदमीसबसे पहलेअपने बच्चों से झूठ बोलना सीखता है,ताकि उनका भरोसा बचा रहे

मज़दूरी के अड्डे पर
सुबह 6 बजेमैं मज़दूरों के अड्डे पर खड़ा होता हूँ
चारों तरफमेरे जैसे लोग
कोई राजमिस्त्री,कोई ईंट ढोने वाला,कोई पेंट करने वाला
सबके कपड़े मैले,लेकिन आँखों मेंएक ही उम्मीद।
ठेकेदार आता है।हम सब उसकी तरफ देखते हैंजैसे भगवान आया हो।

काम मिलना – या किस्मत
आज 10 आदमी चाहिए थे।हम 25 खड़े थे।
मेरा नाम 11वें नंबर पर आया।
मेरे हाथ अपने आप नीचे गिर गए।दिल में कुछ टूटा,लेकिन आवाज़ नहीं आई।
जो चुने गएवो चले गए।
मैं वहीं खड़ा रहा,क्योंकि घर जाने से बेहतरयहाँ खड़ा रहना था।

आधा दिन भूखा
10 बजे तककोई काम नहीं मिला।
पेट में जलन थी।सिर भारी था।
मेरे पास₹10 थे।उसी सेएक सूखी बिस्किट खरीदी
गरीब आदमीभूख कोछोटे टुकड़ों में खाता है।

दोपहर का काम
दोपहर 1 बजेएक आदमी आया।
“मज़दूरी करेगा? ईंट उठानी है।”
मैंने बस सिर हिलाया
₹300 दिन का।शाम 6 बजे तक।
मैंने सोचा —आज घर में चूल्हा जलेगा

मज़दूरी का दर्द
ईंटें उठाते-उठातेमेरे हाथ छिल गए।
पसीना आँखों में जाता,धूल मुँह में।
पीठ दर्द सेसीधी नहीं हो रही थी।
लेकिन मैं रुका नहीं।
गरीब आदमीकाम से नहीं थकता,वो खाली जेब से थकता है।

इंसानियत की एक झलक
एक बूढ़ा आदमीहम सबको पानी पिलाने आया।
उसने कहा:
“बेटा, थोड़ा आराम कर ले”
उस एक लाइन मेंमुझे वो सम्मान मिलाजो पूरे दिन मेंकिसी ने नहीं दिया था।

शाम – पैसे और कटौती
शाम कोठेकेदार ने पैसे दिए।
₹300 में से₹50 काट लिए।
कहा:
“काम धीरे किया।”
मैं कुछ नहीं बोला।
गरीब आदमीअपनी आवाज़रोटी के बदले गिरवी रख देता है।

घर लौटते वक़्त
मैं पैदल घर लौटता हूँ
सड़क पर लोगगाड़ी में जा रहे होते हैं।
मैं उन्हें नहीं देखता।मैं अपने पैरों को देखता हूँजो मुझे रोज़ज़िंदा रखते हैं।

घर की शाम
बच्चे मुझे देखकरदौड़ते हैं।
मेरी पत्नीआँखों से पूछती है:
“आज कितना?”
मैं पैसे रख देता हूँ
उसकी आँखों मेंसुकून आता है।
गरीब औरतपैसे नहीं,सुरक्षा देखती है।

रात का खाना
आजदाल पतली है,रोटी गिनती की।
बच्चे पहले खाते हैं।मैं आख़िर में।
क्योंकि पिताहमेशा आख़िर में खाता है।

रात की सोच (मानसिक संघर्ष)
सब सो जाते हैं।मैं जागता रहता हूँ
सोचता हूँ —क्या मेरी मेहनत की कोई क़ीमत है?क्या मेरे बच्चेमुझसे बेहतर ज़िंदगी जी पाएँगे?
फिर खुद से कहता हूँ:
“कल फिर उठना है।”

गरीबी क्या सिखाती है
गरीबी सिखाती है:
चुप रहना
सहना
और फिर भी मुस्कुराना
गरीबीइंसान कोमजबूत नहीं,मजबूर बनाती है।

मेरी उम्मीद
मैं अमीर नहीं बनना चाहता।मैं बस चाहता हूँ:
रोज़ काम मिले
बच्चों की पढ़ाई चले
बीमार पड़ें तो दवा मिल जाए
क्या ये ज़्यादा माँग है?

मेरी कहानी का सच
अगर कोई ये पढ़ रहा हैतो बस इतना समझ ले:
गरीब आदमीकमज़ोर नहीं होता।वो बसहर दिनखुद को खपा देता है।

आख़िरी बात
ये कहानीकिसी किताब की नहीं,मेरी ज़िंदगी की है।
अगर आपनेयहाँ तक पढ़ लिया,तो शायदआप भीकिसी मज़दूर कोनज़र उठा कर देखेंगे


गरीबी का सच: एक गरीब आदमी की ज़िंदगी की सच्ची कहानी

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