सेठ और गरीब आदमी की जादुई कहानी
एक बड़े शहर में एक बहुत अमीर सेठ रहता था।उसका नाम था सेठ धनराज।उसके पास सोने-चांदी के बर्तन थे।बड़ी-बड़ी हवेलियाँ थीं।अनगिनत नौकर-चाकर थे।
लेकिन उसके चेहरे पर कभी मुस्कान नहीं होती थी।
वहीं उसी शहर के किनारे एक गरीब आदमी रहता था।उसका नाम था मोहन।
मोहन के पास न बड़ा घर था, न धन-दौलत।बस एक छोटी सी झोपड़ी और मेहनत करने वाले दो हाथ थे।
फिर भी उसके चेहरे पर हमेशा संतोष की चमक रहती थी।
सेठ की बेचैनी
सेठ धनराज रात को सो नहीं पाता था।उसे डर लगता था कि कहीं उसका धन चोरी न हो जाए।
वह हर रात अपने खजाने के कमरे में जाकर तिजोरी गिनता।सोने के सिक्के हाथ में लेकर गिनता।फिर भी उसे सुकून नहीं मिलता।
उसे लगता, जितना है कम है।और चाहिए… और चाहिए…
मोहन की खुशी
उधर मोहन दिनभर मजदूरी करता।शाम को घर आता।
उसकी पत्नी चूल्हे पर रोटी बनाती।बच्चे मिट्टी में खेलते।
रात को सब मिलकर सूखी रोटी खाते।फिर हँसते-गाते सो जाते।
उनके पास कुछ नहीं था,पर उनके दिल भरे हुए थे।
एक दिन की मुलाकात
एक दिन सेठ की बग्गी खराब हो गई।वह शहर के बाहर रुक गई।
वहीं पास में मोहन लकड़ी काट रहा था।
सेठ ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।फटे कपड़े… पसीने से भीगा शरीर…पर चेहरे पर चमक।
सेठ ने पूछा,“अरे गरीब! तू इतना खुश क्यों है?”
मोहन मुस्कुराया।“मालिक, पेट भर जाए, परिवार हँस दे,तो जिंदगी क्या कम है?”
सेठ चौंक गया।
सेठ की चाल
सेठ ने सोचा,“इसे आजमाता हूँ।”
उसने मोहन को एक थैली दी।थैली में 100 सोने के सिक्के थे।
मोहन ने जीवन में इतना धन कभी नहीं देखा था।
वह थैली लेकर घर आया।
बदलती रात
उस रात मोहन सो नहीं पाया।
वह बार-बार उठकर सिक्के गिनता।उसे डर था कि कोई चुरा न ले।
पत्नी ने पूछा,“क्या हुआ?”
मोहन बोला,“अब हम अमीर हो गए हैं।”
पर उसके चेहरे की शांति गायब थी।
डर का जन्म
अगले दिन मोहन काम पर नहीं गया।
उसे लगा,“अब मजदूरी क्यों करूँ?”
वह घर में बैठा रहा।
उसे हर आवाज चोर जैसी लगती।हर छाया डर जैसी लगती।
उसकी हँसी गायब हो गई।
सेठ की मुस्कान
कुछ दिनों बाद सेठ फिर उधर से गुजरा।
उसने देखा,मोहन अब पहले जैसा खुश नहीं था।
सेठ मन ही मन मुस्कुराया।
“देखा, धन ही असली ताकत है।”
जादुई मोड़
उसी रात मोहन को सपना आया।
सपने में एक वृद्ध साधु प्रकट हुए।
उन्होंने कहा,“बेटा, धन सुख नहीं देता।संतोष देता है।”
“जो मिला है, बाँट दे।तभी शांति मिलेगी।”
मोहन घबराकर उठ बैठा।
बड़ा फैसला
सुबह होते ही मोहन ने निर्णय लिया।
वह सेठ के घर पहुँचा।
सेठ ने पूछा,“क्यों आए हो?”
मोहन ने थैली आगे कर दी।
“मालिक, ये धन रख लीजिए।मुझे मेरी पुरानी खुशी लौटा दीजिए।”
सेठ हैरान रह गया।
सच्चाई का आईना
मोहन बोला,“इन सिक्कों ने मेरी नींद छीन ली।”
“मेरे घर की हँसी छीन ली।”
“मुझे फिर वही गरीब बना दीजिए,पर खुश रहने दीजिए।”
सेठ के दिल पर जैसे चोट लगी।
सेठ की आँखें खुलीं
सेठ पहली बार सोच में पड़ गया।
उसने अपने जीवन को देखा।
इतना धन…पर न दोस्त…न सच्ची हँसी…न सुकून।
उसे एहसास हुआ—वह सबसे बड़ा गरीब है।
परिवर्तन की शुरुआत
सेठ ने मोहन से कहा,“आज तुमने मुझे सिखा दिया।”
उसने आधा धन गरीबों में बाँटना शुरू किया।
शहर में कुएँ खुदवाए।गरीब बच्चों के लिए स्कूल खुलवाया।
भूखों को खाना बाँटा।
असली जादू
धीरे-धीरे सेठ के चेहरे पर मुस्कान आने लगी।
लोग उसे दुआ देने लगे।
रात को वह चैन से सोने लगा।
उसे पहली बार लगा—सुख खरीदने से नहीं, बाँटने से मिलता है।
मोहन की जिंदगी
मोहन फिर से मजदूरी करने लगा।
पर अब वह पहले से ज्यादा समझदार था।
वह जरूरतमंदों की मदद करता।
उसकी झोपड़ी छोटी थी,पर दिल बड़ा था।
शहर की सीख
पूरा शहर बदल गया।
लोगों ने देखा—धन से बड़ा संतोष है।
सेठ ने सीखा—“सब कुछ होते हुए भी खाली रह सकते हैं।”
मोहन ने सीखा—“संतोष सबसे बड़ा खजाना है।”
अंतिम संदेश
समय बीता।
सेठ बूढ़ा हुआ।मोहन भी बूढ़ा हुआ।
एक दिन दोनों नदी किनारे बैठे थे।
सूरज ढल रहा था।
सेठ बोला,“मोहन, तुम मेरे गुरु हो।”
मोहन हँस पड़ा।
“नहीं मालिक,गुरु तो अनुभव है।”
दोनों हँसते रहे।
कहानी की सीख
धन जरूरी है।पर उससे ज्यादा जरूरी है संतोष।
जो अपने पास है,उसके लिए आभारी रहो।
जो ज्यादा है,उसे बाँटो।
यही असली जादू है।
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