तिलसली नाग और मायावी अप्सरा | श्राप, प्रेम और तिलिस्म की रहस्यमयी कहानी

तिलसली नाग और मायावी अप्सरा की कहानी

तिलसली नाग और मायावी अप्सरा | श्राप, प्रेम और तिलिस्म की रहस्यमयी कहानी


श्राप, प्रेम और तिलिस्म की कहानी

बहुत समय पहले, अरावली की पहाड़ियों और घने साल-वृक्षों से घिरे एक प्राचीन राज्य में एक ऐसा सरोवर था, जिसके बारे में कहा जाता था कि वहाँ चाँदनी उतरकर जल से बातें करती है। उस सरोवर का नाम था — नागकुंड।
गाँव वाले कहते थे कि नागकुंड के गहरे नीले जल में एक तिलसली नाग रहता है — एक ऐसा नाग, जो साधारण नहीं, बल्कि मंत्रों और माया से बंधा हुआ था। उसका नाम था — अनंतसेन
और उसी आकाश में, देवलोक की नृत्यांगनाओं में सबसे अनुपम थी — अप्सरा चंद्रलेखा। उसकी आँखों में तारों की चमक और मुस्कान में चाँदनी की शीतलता थी।
पर नियति ने इन दोनों के लिए जो कहानी लिखी थी, वह प्रेम, श्राप और बलिदान से भरी थी।

श्रापित नाग की कथा
अनंतसेन कभी साधारण नाग नहीं था। वह नागलोक का राजकुमार था। ज्ञान, तपस्या और शौर्य में अद्वितीय।
पर एक बार, देवताओं और नागों के बीच हुए एक विवाद में उसने देवराज के निर्णय का विरोध किया। उसके शब्द सत्य थे, पर स्वर में अहंकार था।
देवराज ने क्रोधित होकर कहा —“अनंतसेन! तुम्हारा ज्ञान तुम्हें विनम्र नहीं बना सका। अब तुम पृथ्वी पर तिलसली नाग बनकर रहोगे। जब तक कोई तुम्हारे भीतर छिपे करुणा और त्याग को न पहचाने, तुम मुक्ति नहीं पाओगे।”
और वह पृथ्वी पर गिरा — नागकुंड के गहरे जल में।
तब से वह वहीं रहता था। रात में उसका फन चाँदनी में चमकता और उसकी आँखों में उदासी झलकती।

मायावी अप्सरा का अपराध
उधर देवलोक में चंद्रलेखा अपनी कला के लिए प्रसिद्ध थी। एक दिन उसने देवसभा में नृत्य करते हुए पृथ्वी की प्रशंसा कर दी —“धरती पर दुख है, पर वहाँ प्रेम भी सच्चा है।”
देवराज को यह बात नागवार गुज़री।“यदि तुम्हें धरती इतनी प्रिय है, तो वहीं जाओ! पर याद रहे — तुम्हारी शक्तियाँ तुम्हारे नियंत्रण में नहीं रहेंगी। तुम मायावी अप्सरा बनकर पृथ्वी पर भटकोगी।”
और चंद्रलेखा को भी श्राप मिला।
वह पृथ्वी पर उतरी — उसी वन में, जहाँ नागकुंड था।

 पहली भेंट
पूर्णिमा की रात थी। चंद्रलेखा सरोवर के किनारे उतरी। उसका रूप इतना अलौकिक था कि पेड़ों की पत्तियाँ भी ठहर गईं।
तभी जल में हलचल हुई।एक विशाल, चमकदार नाग बाहर आया।
दोनों की आँखें मिलीं।
क्षण भर को समय ठहर गया।
अनंतसेन ने पहली बार किसी को देखा, जिसकी आँखों में भय नहीं था।चंद्रलेखा ने पहली बार किसी नाग में करुणा देखी।
“तुम कौन हो?” उसने पूछा।
“एक श्रापित आत्मा,” नाग ने उत्तर दिया।

रहस्य का खुलना
दिन बीतने लगे। चंद्रलेखा अक्सर नागकुंड आती।धीरे-धीरे नाग ने अपनी कथा कही।और अप्सरा ने भी अपना श्राप बताया।
दोनों समझ गए — वे अलग-अलग नहीं, एक ही नियति के बंधन में हैं।
पर श्राप सरल नहीं था।
नाग की मुक्ति तभी होगी जब कोई उसके लिए अपना सबसे प्रिय त्याग दे।और अप्सरा की मुक्ति तभी जब वह अपनी माया छोड़कर सच्चा प्रेम चुने।

तिलिस्म का जागरण
एक रात, अचानक जंगल में आग लग गई।शिकारी दल नागकुंड के पास पहुँच चुका था।
उनका सरदार बोला —“इस सरोवर में खजाना छिपा है। नाग को मारो!”
चंद्रलेखा घबरा उठी।यदि नाग मारा गया, तो उसका श्राप सदा के लिए स्थायी हो जाएगा।
उसने अपनी माया से आकाश में भ्रम रचा।बादल गरजे, बिजली चमकी, शिकारी डरकर भाग गए।
पर माया के उपयोग से उसका श्राप और गहरा हो गया।
अब वह दिन में अदृश्य हो जाती, केवल रात में ही प्रकट हो सकती थी।

प्रेम की परीक्षा
अनंतसेन ने कहा —“मेरे कारण तुम और पीड़ा न सहो। मुझसे दूर चली जाओ।”
चंद्रलेखा मुस्कराई —“प्रेम भागने से नहीं मिटता।”
तभी आकाश से दिव्य वाणी गूँजी —“यदि अप्सरा अपना अमरत्व त्याग दे और नाग अपना अहंकार, तभी दोनों मुक्त होंगे।”
यह कठिन निर्णय था।
अमरत्व त्यागना — देवत्व खो देना।अहंकार त्यागना — अपनी पहचान छोड़ देना।

 अंतिम बलिदान
पूर्णिमा की अगली रात।चंद्रलेखा नागकुंड के किनारे खड़ी हुई।
“मैं अपना अमरत्व त्यागती हूँ,” उसने कहा।
उसका तेज धीरे-धीरे मंद पड़ने लगा।उसके पंख विलीन हो गए।
उधर अनंतसेन ने अपना फन झुका दिया।“मैं अपने अहंकार और प्रतिशोध को त्यागता हूँ।”
सरोवर का जल स्वर्णिम हो उठा।
एक दिव्य प्रकाश फूटा।
जब प्रकाश शांत हुआ, तो वहाँ न नाग था, न अप्सरा।
वहाँ खड़े थे — एक युवक और एक युवती।मानव रूप में।
श्राप टूट चुका था।

नया आरंभ
उन्होंने उसी वन में एक छोटा-सा आश्रम बनाया।लोगों को औषधि दी, ज्ञान दिया, और प्रेम का संदेश फैलाया।
नागकुंड अब भी था, पर उसका जल शांत था।
कहते हैं, आज भी पूर्णिमा की रात वहाँ हल्की चाँदनी में दो परछाइयाँ दिखती हैं —एक नाग की, एक अप्सरा की।
पर वे भय की नहीं, प्रेम और त्याग की प्रतीक हैं।

 कथा का संदेश
यह कहानी हमें सिखाती है —अहंकार सबसे बड़ा श्राप है।और प्रेम सबसे बड़ा तिलिस्म।
तिलसली नाग और मायावी अप्सरा की कथा केवल रहस्य नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है —जहाँ शक्ति से अधिक महत्त्व त्याग का है।

✨ उपसंहार
अरावली के उस वन में आज भी हवा सरसराती है,नागकुंड का जल चाँदनी में चमकता है,और लोग कहते हैं —
जहाँ सच्चा प्रेम और त्याग मिलते हैं,वहीं तिलिस्म टूटते हैं।”

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