टाटम (गुजरात) की लोक-परीकथा | सौराष्ट्र की मिट्टी, मेहनत और मान की प्रेरणादायक कहानी

टाटम (गुजरात) की लोक-परीकथा

टाटम (गुजरात) की लोक-परीकथा | सौराष्ट्र की मिट्टी, मेहनत और मान की प्रेरणादायक कहानी


सौराष्ट्र की मिट्टी, मेहनत और मान की प्रेरणादायक कहानी

सौराष्ट्र की मिट्टी, मेहनत और मान की प्रेरणादायक कहानी
सौराष्ट्र की धरती अलग ही स्वभाव की होती है।यह धरती आसानी से कुछ नहीं देती, पर जो इसे समझ ले, उसे कभी खाली हाथ नहीं लौटाती।
भावनगर ज़िले की सीमा पर, सूखी पहाड़ियों और कंटीली झाड़ियों के बीच बसा था एक छोटा-सा गाँव — टाटम।न कोई बड़ी सड़क, न ऊँची इमारतें।बस मिट्टी के घर, खपरैल की छतें, और लोगों के चेहरों पर धूप से जली हुई सच्चाई।
टाटम के लोग कहते थे—“અમે જમીન જેટલા કઠોર છીએ, પણ દિલથી સાફ.”(हम ज़मीन जितने सख़्त हैं, पर दिल से साफ़ हैं।)

🌵 सूखे की आदत वाला गाँव
टाटम में बारिश मेहमान की तरह आती थी —कभी समय पर, कभी बहुत देर से, और कई बार आती ही नहीं।
खेतों में ज़्यादातर बाजरा, ज्वार और मूंग उगाई जाती।कपास यहाँ कम ही होती, क्योंकि पानी भरोसे का नहीं था।
गाँव के बीचों-बीच एक पुराना कुआँ था —“झालावાળો कुआँ”।पानी कम था, पर वही टाटम की साँसें चलाता था।
औरतें सुबह-सुबह मटके लेकर लाइन में लगतीं।कभी झगड़ा, कभी हँसी।यही ज़िंदगी थी।


👦 रतन — टाटम की मिट्टी में पला बेटा
इसी गाँव में पैदा हुआ था रतन।साँवला रंग, मजबूत कद, और आँखों में अजीब-सी शांति।
रतन के पिता, हरजीभाई, एक छोटे किसान थे।एक साल भयंकर सूखा पड़ा और कर्ज़ में दबकर उनका देहांत हो गया।
घर में बची थीं —रतन की माँ जीविबा और उसकी बूढ़ी दादी कुंवरबा।
कुंवरबा अकसर कहा करती—“બેટા, પૈસા જાય તો ચાલે, પણ માન ન જાય.”(बेटा, पैसा जाए तो चले, पर सम्मान नहीं जाना चाहिए।)

🌾 मेहनत ही पूँजी
रतन ने बचपन से ही मेहनत देखी थी।स्कूल छूटा, पर संस्कार नहीं।
कभी किसी के खेत में मजदूरी,कभी कुएँ से पानी खींचना,तो कभी गाँव के बाहर पत्थर तोड़ना।
शाम को माँ के हाथ की सूखी रोटी और छाछ —यही उसका भोजन था।
पर रतन के मन में एक बात हमेशा घूमती रहती—
“अगर टाटम में एक नया कुआँ हो जाए, तो कोई भूखा नहीं रहेगा।”

🌙 पंचायत और हँसी
एक दिन पंचायत बैठी।सूखे ने हाल बेहाल कर दिया था।
कोई बोला—“शहर चले जाते हैं।”
कोई बोला—“सरकार कुछ करेगी।”
तभी रतन खड़ा हुआ।
“अगर हम खुद कुछ नहीं करेंगे, तो टाटम खत्म हो जाएगा,” उसने कहा।“हमें नया कुआँ खोदना चाहिए।”
पंचायत में हँसी गूँज गई।
“अरे रतन, कुआँ राजा बनवाते हैं,”“तेरे जैसे मजदूर का काम नहीं।”
रतन चुप बैठ गया, पर उसकी आँखों में हार नहीं थी।

🌳 केसरिया बबूल और रात का सच
गाँव के बाहर एक पुराना केसरिया बबूल था।लोग मानते थे कि वह टाटम की आत्मा जानता है।
एक रात रतन वहीं बैठा था।हवा गरम थी, आसमान तारों से भरा।
अचानक किसी ने कहा—“રતન…”
रतन काँप गया।
सामने एक बुज़ुर्ग खड़ा था।साधारण धोती, कंधे पर गमछा।
“डर मत,” उसने कहा,“मैं कोई देवता नहीं, मैं टाटम की आवाज़ हूँ।”

🧿 तीन चीज़ें, एक फैसला
बुज़ुर्ग ने ज़मीन पर तीन चीज़ें रखीं—
1️⃣ चाँदी का सिक्का2️⃣ लोहे का फावड़ा3️⃣ सूखी बाजरे की रोटी
“एक चुन,” उसने कहा।
रतन ने रोटी उठा ली।
“क्यों?”
रतन बोला—“भूखा आदमी कभी गाँव नहीं बचा सकता।”
बुज़ुर्ग मुस्कुराया।“टाटम अब भी ज़िंदा है।”

⛏️ अकेली शुरुआत
अगले दिन रतन ने बबूल के पास खुदाई शुरू की।अकेला।
लोग हँसे।“पागल हो गया है।”
माँ डर गई।पर दादी बोली—“જાવા દે, આ માટી એની ઓળખ છે.”(जाने दो, यह मिट्टी उसकी पहचान है।)
दिन बीतते गए।हाथ छिल गए, पीठ झुक गई।
पानी नहीं निकला।

🤝 साथ की ताक़त
एक दिन गाँव का एक लड़का आया।फिर दूसरा।फिर तीसरा।
सबने कहा—“अगर रतन नहीं रुका, तो हम क्यों रुकें?”
धीरे-धीरे पूरा टाटम जुट गया।
औरतें पानी लातीं,बुज़ुर्ग हौसला देते।

💧 मेहनत का फल
हफ़्तों बाद, एक शाम—
फावड़ा गीली मिट्टी में धँसा।फिर एक ठंडी धार फूटी।
पानी!
कोई चमत्कार नहीं।यह सौराष्ट्र की मिट्टी का इनाम था।

🎉 टाटम की नई सुबह
कुएँ का नाम रखा गया —“માન કૂવો” (सम्मान का कुआँ)
पंचायत ने घोषणा की—“यह कुआँ किसी एक का नहीं, पूरे टाटम का है।”
रतन रो पड़ा।

🌱 बदलता गाँव
खेत हरे होने लगे।लोग शहर से लौट आए।
रतन को सरपंच बनने को कहा गया।उसने मना कर दिया।
“मैं सेवा करना चाहता हूँ, राज नहीं।”

🌸 लोक-सीख
👉 सौराष्ट्र की मिट्टी सख़्त है, पर सच्चाई से पिघल जाती है।👉 गाँव तभी बचता है, जब कोई अपने मान को सबके मान से जोड़ दे।👉 चमत्कार नहीं होते — मेहनत इतिहास बनाती है।
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