सिंघम फिर से गर्जा | ईमानदार पुलिस अफसर की अंतिम लड़ाई
प्रस्तावना
सूरज की पहली किरण जब समुद्र किनारे बसे शहर रत्नपुर की ऊँची इमारतों पर पड़ी, तो शहर हमेशा की तरह भागने लगा—ट्रैफिक की आवाज़, हॉर्न, बाज़ार की चहल-पहल और सत्ता के गलियारों में चल रही साजिशें।
पर इस शोर के पीछे एक खामोश डर भी था।
डर—एक ऐसे नाम का, जो कानून से ऊपर समझा जाने लगा था।
और उसी डर के सामने एक नाम था…जो डर को डराता था।
शहर का एसपी।ईमानदार।निडर।और न्याय के लिए अपनी जान तक दाँव पर लगाने वाला।
लोग कहते थे—“जब सिंह गर्जता है, तो अन्याय काँपता है।”
अध्याय 1 – सत्ता का अंधेरा
रत्नपुर की सत्ता पर कब्ज़ा था उद्योगपति और छुपे हुए अपराध साम्राज्य के मालिक राघव भाटिया का। बाहर से वह समाजसेवी, दानवीर और प्रभावशाली व्यापारी था। लेकिन अंदर से—नशे का कारोबार, अवैध हथियार, मानव तस्करी और राजनीतिक खरीद-फरोख्त उसका असली चेहरा थे।
उसका एक ही नियम था—“जो झुके, उसे इनाम।जो उठे, उसे खत्म।”
पुलिस विभाग में भी उसके आदमी थे। लेकिन एक नाम था जो उसकी आँखों में चुभता था—
विक्रम सिंह।
विक्रम ने आते ही 6 महीने में 40 से ज़्यादा गैंग खत्म किए, अवैध गोदाम सील किए और कई नेताओं के नाम उजागर किए।
राघव ने पहली बार अपने दाहिने हाथ कुंदन से कहा—
“यह आदमी नहीं, तूफान है।अगर इसे अभी नहीं रोका… तो यह हमें डुबो देगा।”
अध्याय 2 – पहला टकराव
एक रात सूचना मिली—बंदरगाह पर हथियारों की बड़ी खेप उतर रही है।
विक्रम ने बिना देरी किए टीम बनाई।बारिश हो रही थी।आकाश में बिजली चमक रही थी।
गोदाम के अंदर 20 से ज्यादा गुंडे हथियार उतार रहे थे।
“घेर लो!” – विक्रम की आवाज़ गूँजी।
गोलियाँ चलीं।बारूद की गंध हवा में फैल गई।
विक्रम ने अकेले 5 गुंडों को ढेर किया। कुंदन सामने आया।
“बहुत ईमानदारी दिखा ली, एसपी साहब!” – कुंदन हँसा।
विक्रम ने जवाब में सिर्फ एक मुक्का मारा।
कुंदन जमीन पर गिर पड़ा।
उसी वक्त पुलिस ने पूरा गोदाम सील कर दिया।
अगली सुबह अखबारों की हेडलाइन थी—
“एसपी विक्रम ने हथियार माफिया का भंडाफोड़ किया।”
राघव की तस्वीर के पीछे छुपा साम्राज्य पहली बार हिला था।
अध्याय 3 – व्यक्तिगत वार
राघव समझ चुका था—सीधे भिड़ना बेकार है।
उसने विक्रम के परिवार पर वार करने का फैसला किया।
विक्रम की पत्नी अनन्या, जो एक स्कूल टीचर थी, और 10 साल की बेटी आशा—विक्रम की दुनिया थे।
एक शाम जब अनन्या स्कूल से लौट रही थी, उसकी गाड़ी का पीछा किया गया।
ब्रेक फेल।गाड़ी पलटी।
अनन्या गंभीर रूप से घायल हो गई।
विक्रम अस्पताल पहुँचा।उसकी आँखों में पहली बार गुस्से के साथ दर्द भी था।
अनन्या ने धीमे से कहा—“विक्रम… डरना मत… सच के रास्ते से हटना मत…”
विक्रम ने उसकी हथेली पकड़ी।
उस दिन उसने कसम खाई—
“अब यह लड़ाई सिर्फ कानून की नहीं… इंसाफ की है।”
अध्याय 4 – सिस्टम के भीतर गद्दार
जाँच में पता चला—ब्रेक से छेड़छाड़ अंदर के किसी आदमी ने करवाई थी।
डिप्टी कमिश्नर शेखावत—जो बाहर से ईमानदार दिखता था, असल में राघव का आदमी निकला।
विक्रम ने बिना सबूत के कुछ नहीं किया।उसने गुप्त निगरानी शुरू की।
एक रात शेखावत और राघव की मुलाकात रिकॉर्ड हो गई।
वीडियो में साफ था—
“एसपी ज्यादा दिन नहीं बचेगा।” – शेखावत की आवाज़।
अगले दिन विक्रम ने पूरे विभाग के सामने वीडियो चला दिया।
शेखावत गिरफ्तार हुआ।
सिस्टम हिल गया।
राघव अब खुलकर दुश्मन बन चुका था।
अध्याय 5 – शहर में दहशत
राघव ने शहर में दंगे भड़काने की योजना बनाई।दो समुदायों के बीच झूठी अफवाहें फैलाई गईं।
शहर जलने लगा।
विक्रम ने कर्फ्यू लगाया।खुद सड़कों पर उतर आया।
“कोई पत्थर नहीं चलेगा!” – उसकी गर्जना भीड़ पर भारी पड़ी।
उसने दोनों पक्षों के बुजुर्गों को बुलाया।
“आप लड़ेंगे… और फायदा उसे होगा जो पीछे बैठा है।”
लोग शांत हुए।
दंगा रुक गया।
राघव की एक और चाल नाकाम।
अध्याय 6 – आखिरी साजिश
राघव ने अंतिम योजना बनाई।
शहर के बीचोंबीच मॉल में बम लगाने की योजना।
हजारों लोग अंदर।
विक्रम को गुप्त सूचना मिली।
टीम के साथ वह पहुँचा।
मॉल के बेसमेंट में टाइमर लगा था—10 मिनट।
बम निष्क्रिय करने वाला अधिकारी घायल हो चुका था।
विक्रम ने खुद तार काटने का फैसला किया।
पसीना।धड़कन तेज।घड़ी 00:01 पर पहुँची—
तार कट गया।
मॉल बच गया।
लेकिन बाहर निकलते ही राघव सामने खड़ा था।
“हीरो बन गए?” – राघव हँसा।
विक्रम ने कहा—“आज कहानी खत्म होगी।”
अध्याय 7 – अंतिम मुकाबला
बारिश फिर शुरू हो गई।
खाली सड़क।
दोनों आमने-सामने।
राघव ने गोली चलाई।विक्रम के कंधे में लगी।
लेकिन वह रुका नहीं।
उसने दौड़कर राघव को पकड़ा।
घूंसे, लातें, संघर्ष।
आखिरकार विक्रम ने राघव को जमीन पर गिराया।
“कानून से बड़ा कोई नहीं।” – विक्रम की आवाज़ गूँजी।
पुलिस पहुँची।
राघव गिरफ्तार हुआ।
अध्याय 8 – न्याय की जीत
कोर्ट में सबूत पेश हुए।
राघव को आजीवन कारावास।
शहर ने राहत की साँस ली।
अस्पताल में अनन्या धीरे-धीरे ठीक हो रही थी।
आशा ने अपने पिता से पूछा—
“पापा… आप डरते नहीं?”
विक्रम मुस्कुराया—
“डरता हूँ… पर सच के लिए डर से लड़ता हूँ।”
उपसंहार – सिंघम फिर से गर्जेगा
कुछ महीनों बाद…
विक्रम फिर से वर्दी पहनकर आईने के सामने खड़ा था।
आँखों में वही आग।
शहर में शांति थी।
लेकिन अन्याय कभी खत्म नहीं होता।
फोन बजा—
“सर, सीमा पार से नया गिरोह शहर में घुसा है…”
विक्रम ने टोपी पहनी।
हल्की मुस्कान आई।
“तो फिर… सिंह फिर से गर्जेगा।”
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