हामिद का चिमटा | ममता, त्याग और सच्चे प्रेम की कहानी

हामिद का चिमटा

हामिद का चिमटा | ममता, त्याग और सच्चे प्रेम की कहानी


ममता, त्याग और सच्चे प्रेम की प्रेरणादायक कहानी

रमजान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद का चाँद नजर आया था। गाँव की मस्जिद से “अल्लाहु अकबर” की आवाज़ के साथ ही पूरे माहौल में खुशी की लहर दौड़ गई। छोटे-छोटे बच्चे नए कपड़ों में इधर-उधर दौड़ रहे थे। घर-घर में सेवइयाँ बन रही थीं। हर चेहरे पर मुस्कान थी।
लेकिन उस खुशी के बीच एक छोटा-सा घर ऐसा भी था जहाँ खुशी के साथ चिंता भी थी।
उस छोटे से मिट्टी के घर में रहता था आठ साल का मासूम बालक — हामिद। दुबला-पतला, साँवला रंग, आँखों में मासूम चमक और चेहरे पर अजीब-सी गंभीरता। उसकी दुनिया में बस एक ही सहारा था — उसकी बूढ़ी दादी आमिना।
हामिद के माँ-बाप अब इस दुनिया में नहीं थे। पिता कुछ साल पहले बीमारी से चल बसे थे और माँ भी दुख सहते-सहते भगवान को प्यारी हो गई थी। दादी ही उसका सब कुछ थीं — माँ भी, बाप भी और दुनिया भी।

ईद की सुबह
ईद की सुबह गाँव में जैसे जश्न उतर आया था। बच्चे नए कुरते-पायजामे पहनकर ईदगाह जाने की तैयारी कर रहे थे। उनके हाथों में सिक्कों की खनक थी, जेबों में चवन्नी-अठन्नी, और दिल में मेले का सपना।
हामिद भी ईदगाह जाने को तैयार था। उसके पास नया कपड़ा तो नहीं था, लेकिन उसकी आँखों में उम्मीद की चमक थी।
दादी आमिना ने अपने पुराने संदूक से तीन पैसे निकालकर हामिद की हथेली पर रख दिए।
“बेटा, बस यही हैं हमारे पास। संभालकर खर्च करना। कुछ मीठा खा लेना।”
हामिद ने मुस्कुराकर पैसे जेब में रख लिए।“दादी, आप चिंता मत करो। मैं समझदारी से खर्च करूँगा।”
आमिना की आँखें भर आईं। वह जानती थीं तीन पैसों में क्या आएगा, लेकिन फिर भी उन्होंने खुद को संभाल लिया।

ईदगाह का रास्ता
गाँव के सारे बच्चे एक साथ ईदगाह की ओर चल पड़े। हामिद भी उनके साथ था।
रास्ते में सब अपनी-अपनी योजनाएँ बता रहे थे—
“मैं मिठाई खाऊँगा!”“मैं खिलौना खरीदूँगा!”“मैं बिगुल लूँगा!”
हामिद चुप था। वह सबकी बातें सुन रहा था। उसके मन में भी हल्की-सी इच्छा थी कि वह कुछ अच्छा खरीदे। लेकिन जेब में रखे तीन पैसे उसे बार-बार याद दिला रहे थे कि सोच-समझकर खर्च करना है।
ईदगाह में नमाज़ अदा हुई। सबने एक-दूसरे को गले लगाया — “ईद मुबारक!”
अब बच्चों का काफिला मेले की ओर बढ़ चला।

राजा और गाँव का लुहार की कहानी – पढ़ें यह

मेले की चहल-पहल
मेले में रंग-बिरंगे झूले लगे थे। मिठाइयों की दुकानों से खुशबू आ रही थी। खिलौनों की कतारें सजी थीं — मिट्टी के सिपाही, घोड़े, हाथी, पुलिस वाले, राजा-रानी।
हामिद के दोस्तों ने झटपट पैसे निकाल लिए।
महमूद ने मिट्टी का सिपाही खरीदा।मोहसिन ने पुलिसवाला लिया।नूर ने बिगुल खरीदा।सलीम ने मिठाई खाई।
सबके चेहरे खुशी से चमक रहे थे।
हामिद भी खिलौनों को देख रहा था। उसका मन भी ललचा रहा था। वह सोचने लगा — “अगर मैं भी खिलौना ले लूँ तो…?”
लेकिन तभी उसे दादी की याद आई।

दादी की जलती उँगलियाँ
उसे याद आया कि जब भी दादी रोटी बनाती थीं, तवे से रोटी उतारते समय उनकी उँगलियाँ जल जाती थीं। घर में चिमटा नहीं था। वे कपड़े से रोटी पकड़तीं और कई बार जल जातीं।
हामिद ने कितनी बार देखा था — दादी चुपचाप दर्द सह लेती थीं, लेकिन चेहरे पर मुस्कान रखती थीं।
“काश, हमारे घर में चिमटा होता…” उसने मन ही मन सोचा।
उसी समय उसकी नजर एक लोहे के सामान की दुकान पर पड़ी। वहाँ तवे, कड़ाही, और चिमटे रखे थे।
एक छोटा-सा चिमटा तीन पैसों का था।
हामिद का दिल जोर से धड़कने लगा।

मन का संघर्ष
एक तरफ रंगीन खिलौने थे, मिठाइयाँ थीं, झूले थे…दूसरी तरफ वह साधारण-सा चिमटा।
उसके दोस्त हँसते हुए बोले —“अरे हामिद! तू कुछ नहीं खरीदेगा?”
हामिद ने कहा — “हाँ, देख रहा हूँ।”
वह चिमटे को हाथ में लेकर सोचने लगा —“अगर मैं यह ले जाऊँ, तो दादी खुश होंगी। उनकी उँगलियाँ नहीं जलेंगी।”
पर फिर मन में आवाज आई —“लेकिन बाकी बच्चे खिलौनों से खेलेंगे… मैं क्या करूँगा?”
कुछ पल के लिए उसका मन डोल गया। वह भी बच्चा ही तो था।
लेकिन अगले ही क्षण दादी का चेहरा आँखों के सामने आ गया — पसीने से भीगा चेहरा, तवे की गर्मी, जली हुई उँगलियाँ।
हामिद ने फैसला कर लिया।

चिमटे की खरीद
“चाचा, यह चिमटा कितने का है?”
“तीन पैसे का।” दुकानदार ने कहा।
हामिद ने जेब से तीनों पैसे निकाले और चिमटा खरीद लिया।
उसके दोस्त हँस पड़े।
“अरे, यह क्या लिया तूने? चिमटा?”“क्या करेगा इसका?”“बूढ़ा बन गया क्या?”
हामिद ने आत्मविश्वास से कहा —“तुम्हारे खिलौने मिट्टी के हैं, गिरेंगे तो टूट जाएँगे। मेरा चिमटा लोहे का है, कभी नहीं टूटेगा!”
सब बच्चे थोड़ी देर के लिए चुप हो गए।

घर वापसी
मेले की रौनक पीछे छूट गई। बच्चे अपने-अपने खिलौनों के साथ घर लौटने लगे।
रास्ते में किसी का सिपाही गिरकर टूट गया। किसी का बिगुल बंद हो गया। किसी की मिठाई खत्म हो गई।
लेकिन हामिद का चिमटा वैसा ही चमक रहा था।
वह मन-ही-मन सोच रहा था —“दादी इसे देखकर कितनी खुश होंगी!”

दादी की प्रतिक्रिया
जब हामिद घर पहुँचा, दादी दरवाजे पर बैठी उसका इंतजार कर रही थीं।
“आ गए बेटा? क्या लाए?”
हामिद ने मुस्कुराते हुए चिमटा आगे कर दिया।
आमिना कुछ पल के लिए समझ नहीं पाईं।“यह… चिमटा?”
उनकी आँखों में आश्चर्य था।
“हाँ दादी! जब आप रोटी बनाती हो तो हाथ जल जाता है। अब यह रहेगा तो आपको दर्द नहीं होगा।”
दादी की आँखों से आँसू बह निकले।
वह हामिद को सीने से लगाकर रो पड़ीं।
“मेरे बच्चे… तूने अपने लिए कुछ नहीं लिया?”
हामिद ने मासूमियत से कहा —“मेरे लिए आप हो ना, दादी!”

त्याग की सच्ची खुशी
उस रात घर में कोई मिठाई नहीं थी। कोई खिलौना नहीं था। लेकिन उस छोटे-से घर में एक अनमोल खुशी थी — प्रेम की खुशी।
दादी ने उसी चिमटे से रोटी उतारी। उँगलियाँ नहीं जलीं।
उन्होंने आसमान की ओर देखकर कहा —“हे खुदा! तूने मुझे कितना समझदार बच्चा दिया है।”
हामिद चुपचाप मुस्कुरा रहा था। उसके लिए वह चिमटा किसी खिलौने से कम नहीं था। वह उसका गर्व था, उसका प्रेम था।

समय का चक्र
साल बीतते गए। हामिद बड़ा हुआ। मेहनत की, पढ़ाई की, काम किया। गाँव में उसकी मिसाल दी जाने लगी।
लोग कहते —“जिस बच्चे ने तीन पैसों में चिमटा खरीदा था, वही आज इतना बड़ा इंसान बना है।”
लेकिन हामिद कभी नहीं बदला। वह आज भी उस चिमटे को संभालकर रखता था।
वह कहता —“यह सिर्फ चिमटा नहीं है, यह मेरी दादी की दुआ है।”

कहानी का संदेश
यह कहानी हमें सिखाती है—
सच्चा प्रेम त्याग में छिपा होता है।
समझदारी उम्र से नहीं, दिल से आती है।
छोटे-छोटे फैसले जीवन की दिशा बदल देते हैं।
खुशी पाने से नहीं, देने से मिलती है।
ईद का असली अर्थ मिठाई या कपड़े नहीं, बल्कि प्रेम और करुणा है।

निष्कर्ष
उस छोटे-से गाँव में आज भी जब ईद आती है, लोग बच्चों को यह कहानी सुनाते हैं —“हामिद का चिमटा”
ताकि हर बच्चा समझे —सच्ची खुशी अपने लिए नहीं, अपनों के लिए जीने में है।
Tags
हामिद का चिमटा
प्रेरणादायक कहानी
हिंदी कहानी
ईद की कहानी
भावनात्मक कहानी
बच्चों की कहानी
त्याग की कहानी
दादी और पोता
Moral Story Hindi
Hindi Story Blog

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ